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रंग लाया बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ का संघर्ष, समान कार्य के लिए समान वेतन, एक ऐतिहासिक फैसला

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सांकेतिक चित्र
विशेष रिपोर्ट.
बिहार. 04 जनवरी. देश के शिक्षा के इतिहास में 31 अक्टूबर 2017 की तारीख ऐतिहासिक तारीख बन गई. इस दिन पटना उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन और डॉक्टर अनिल कुमार उपाध्याय की दो सदस्यीय खंडपीठ ने बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ की याचिका और कुछ अन्य याचिकाओं में समान काम के लिए समान वेतन लागू करने का अपना ऐतिहासिक फैसला घोषित किया. जिसके बाद बिहार सहित देश के अन्य राज्यों में नियुक्त पैरा शिक्षक, कांट्रेक्ट शिक्षक, नियत वेतन के शिक्षक अथवा इस प्रकार की संज्ञा वाले अन्य प्रकार के शिक्षक समूह में खुशी की लहर दौड़ गई.
केदारनाथ पांडेय, अध्यक्ष, बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ
देश की शिक्षा व्यवस्था में 18 अगस्त 2015 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शालाओं में सभी बच्चों को समान स्कूल प्रणाली के द्वारा समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुलभ कराने का ऐतिहासिक फैसला दिया था. यह फैसला भी बच्चों, शिक्षकों की हकमारी करने वाली देश की सरकारों के मुंह पर करारा तमाचा है. विडंबना यह है, कि देश के संविधान की उद्देशिका में भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी, पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित करने वाली सरकारें आजादी के 70 वर्षों बाद भी देश के सभी बच्चों को समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैय्या नहीं करा रही हैं. बल्कि संसद द्वारा 1968 और1986 में दो बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति में समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के वायदे के विपरीत आचरण कर रही हैं तथा शिक्षा पर जीडीपी का 6 फीसदी खर्च करने से भी मुकर रही हैं.
बिहार में यूँ तो 1990 के दशक से ही शिक्षा की तस्वीर धुंधली होने लगी थी, लेकिन 2006 में नीतिश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनने के बाद शिक्षकों के छह दशक से अनवरत आंदोलनों के फलस्वरुप प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के सरकारीकरण के सिद्धांत को केंद्र के हाशिये पर सरकाते हुए, सरकार ने शिक्षकों की नई नियोजन नियमावली 2006 लागू करके, ना केवल मेधावी बेरोजगार नौजवानों का शोषण किया, बल्कि उन्हें कमतर वेतन देकर निरंकुश काम किया. शिक्षा क्षेत्र में शोषण की शासकीय परंपरा और विधान का श्रीगणेश संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के आलोक में सृजित हुआ. राज्य सरकार ने विद्यालयों के प्रबंध एवं नियंत्रण ग्रहण अधिनियम 1981 की धारा 10 को संशोधित कर नियोजन नियमावली 2006 के नियम 6 एवं 8 के द्वारा शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया एवं सेवा शर्तें निर्धारित कर दीं. सरकार ने वाहवाही लूटने के नाम पर पंचायती राज संस्थाओं की 21 इकाइयों के माध्यम से नियुक्ति एवं सेवा शर्तें निरूपित कर संविधान के अनुच्छेद 14 में वर्णित विधि के समक्ष समता के सिद्धांत को सार्वजनिक रुप से खंडित कर दिया. राज्य का यह कृत्य शिक्षा के क्षेत्र में ना केवल गैरबराबरी एवं भेदभावकारी है, बल्कि समाज के वंचित एवं शोषित पीड़ित बच्चों के अधिकार के विरुद्ध है. जबकि उन्हें भी उच्च वर्गों के बच्चों के समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने का अधिकार है. सरकार का यह कृत्य राज्य के भविष्य के प्रति भी एक प्रकार का षड्यंत्र है. यह भी पढ़ें : चमार और महार समुदाय का बुनियादी फर्क सामने आया, चमार रेजीमेंट के शौर्य की इबारत शौर्य दिवस के मुकाबले कहीं ज्यादा चमकीली  इसी षड्यंत्र को लक्ष्य कर बिहार माध्यमिक शिक्षा संघ ने पटना उच्च न्यायालय में नियोजित शिक्षकों को समान कार्य के बदले समान वेतन लागू करने के संबंध में 2009 में याचिका दाखिल की. इस बीच 26 अक्टूबर 2016 को एक मामले में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर और एम. ए बाब्डे का एक नया निर्णय सामने आया, जिसमें समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत को लागू करने के संबंध में न्यायालय से गुहार लगाई गई थी. माननीय न्यायालय का न्याय निर्णय था, कि समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत अस्थाई वर्कचार्ज डेली वेजेज एडहॉक, कांट्रेक्ट सभी प्रकार के कर्मचारियों पर लागू होगा, यदि वह समान कार्य और समान दायित्व का निर्वहन करते हों. फिर चाहे नियुक्ति की विधि एवं प्रक्रिया जो भी हो.
बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के संघर्षों की शानदार परंपरा रही है. इसने ना केवल निजी क्षेत्र द्वारा स्थापित विद्यालयों की प्रबंध समितियों के खात्मे की लड़ाई जीती है, बल्कि राज्य एवं राज्यीकृत विद्यालयों के शिक्षकों के बीच मौजूद वेतन विषमता, प्रोजेक्ट विद्यालयों के शिक्षकों की सेवा संपुष्टि, वेतनमान, अल्पसंख्यक शिक्षकों की क्षमता की अनेक लड़ाइयां भी जीती हैं. इसने 1981 के चौथे वेतनमान और अराजपत्रित कर्मियों और राजपत्रित पदाधिकारियों के साथ 1986 के केंद्रीय वेतनमान और सेवा शर्तों की अनेक लड़ाइयों का नेतृत्व भी किया है. आज शिक्षा क्षेत्र में जो कुछ भी बेहतर है चाहे शिक्षकों के वेतनमान, भत्ते, सेवोत्तर लाभ या छात्रों के पाठ्यक्रम मूल्यांकन की लड़ाई, सबको सफलतापूर्वक लड़कर हासिल किया है. इसी क्रम में बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ ने इसे भी चुनौती के रूप में स्वीकारा तथा इसने नियोजित शिक्षकों की पहली लड़ाई 2010 में लड़ी थी. लेकिन शिक्षकों की भ्रमात्मक स्थिति और नियमित शिक्षकों के असहयोगात्मक रवैय्ये के कारण अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी. फिर भी क्रांतियां कभी नि:संतान नहीं होती की तर्ज पर 2010 का संघर्ष भी असफल नहीं माना जा सकता. संघ को विश्वास था कि 2015 में विधानसभा के चुनाव के पूर्व एक मजबूत लड़ाई लड़ी जा सकती है और नियोजित शिक्षकों के वेतनमान की लड़ाई जीती जा सकती है. सचमुच 2015 की लड़ाई में इन शिक्षकों को भत्ता, आवास भत्ता, चिकित्सा भत्ता सहित एक वेतनमान मुहैय्या कराया. यदि नियोजित शिक्षकों के एक समूह द्वारा समझौते में गड़बड़ी नहीं दिखाई गई होती, तो समान काम के लिए समान वेतन की लड़ाई 2015 में ही हल हो गई होती. इस आंदोलन के साथ संघ ने संसदीय और न्यायालय की लड़ाई को भी जारी रखा और अक्टूबर की 31 तारीख ऐतिहासिक तारीख बन गई. सरकार ने विभिन्न नियमों का हवाला देकर इन शिक्षकों को पंचायती राज संस्थानों का शिक्षक घोषित कर समान कार्य के बदले समान वेतन देने से मना किया. उसका तर्क था, कि संविधान के 73वें तथा 74वें संशोधनों के आलोक में यह शिक्षक पंचायती राज संस्थाओं की विभिन्न इकाइयों द्वारा नियोजन नियमावली 2006 की धारा 6 के अंतर्गत नियुक्त हैं. और धारा 8 के आलोक में इनको सेवा शर्तें निर्धारित हैं. उन्होंने नियुक्ति के पूर्व एक अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर भी किये हैं, कि हमें नियत वेतन और सरकार की शर्तें स्वीकार्य हैं, इसलिए यह समान काम के लिए समान वेतन के हकदार नहीं हैं.
किंतु विद्वान न्यायाधीश डॉ. अनिल कुमार उपाध्याय ने संघ के विद्वान अधिवक्ता द्वारा उपस्थित तथ्यों के आधार पर सरकारी साक्ष्यों को खारिज करते हुए यह मत व्यक्त किया कि नियोजन नियमावली 2006 शिक्षा विभाग द्वारा निर्मित नियमावली है. शिक्षकों की नियुक्ति राजकीय, राज्यीकृत, प्रोजेक्ट विद्यालय में हुई है, जो सरकारी विद्यालय है. राज्य में स्थानीय स्वशासन को विद्यालय स्थापित करने का अधिकार सरकार ने नहीं प्रदान किया है. शिक्षा विभाग ने समय-समय पर इनके वेतन में बढ़ोतरी भी की है. न्यायाधीश डॉ. उपाध्याय का तर्क था, कि राज्य में अल्प वेतन के शिक्षकों से शिक्षा का वातावरण बुरी तरह प्रभावित हुआ है. और कोचिंग संस्थान कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं.
न्यायाधीश के अनुसार सेवा में इंसेंटिव और प्रोन्नति कर्मी को श्रेष्ठ करने की प्रेरणा देते हैं. शिक्षकों को चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी से कम वेतन देना संविधान के समक्ष शोषण और समानता के सिद्धांत के प्रतिकूल है. सरकार ने 11 अगस्त 2015 को वेतनमान लागू कर अप्रत्यक्ष रूप से इसे स्वीकार लिया है, कि इन शिक्षकों के साथ नैसर्गिक न्याय और युक्ति युक्त व्यवहार नहीं हो रहा है. सरकार नेपथ्य से नियुक्ति नियमावली और प्रोन्नति नियमावली बनाकर वर्ग में वर्ग पैदा करने की नीति अख्तियार कर रही है. उसने सातवां वेतनमान लागू करने से भी भेदभाव की नीति अख्तियार किया है. यह अनुचित शोषणकारी पीड़क और अपमानजनक है तथा संविधान के अनुच्छेद 14 और देश का उल्लंघन है.
राज्य सरकार द्वारा 16 अक्टूबर 2017 को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत आर्थिक संकट की अवधारणा और राज्य का विकास बाधित करने की परिकल्पना को भी न्यायालय ने इस आधार पर खारिज कर दिया है कि आर्थिक आधार पर भेदभाव की नीति संविधान के अनुच्छेद 14 की अवहेलना है. एक विद्यालय में दो प्रकार के शिक्षकों की परिकल्पना नहीं की जा सकती जबकि दोनों के दायित्व और कार्य समान हैं.
संघ की याचिका को स्वीकृत करते हुए न्यायमूर्ति ने स्पष्ट कर दिया है, कि नियुक्ति तिथि से काल्पनिक तौर पर और प्रथम याचिका दाखिल करने की तिथि यानी 8 दिसंबर 2009 से वास्तविक रूप से भुगतान की कार्रवाई की जाए. निर्णय की तिथि से 3 माह के अंतर्गत प्रक्रिया पूरी करते हुए अगले 3 महीने में सभी कोटि के नियोजित शिक्षकों को भुगतान किया जाए.
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मेनन ने डॉ. उपाध्याय के निर्णय से सहमति व्यक्त करते हुए मत व्यक्त किया है कि राज्य को एक आदर्श नियोक्ता के दायित्व का निर्वाह करना चाहिए. उसे अपने नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित करते हुए समुचित, नया पूर्ण, वैधानिक सम्मानजनक, पारिश्रमिक देना चाहिए, ताकि आर्थिक आधार पर किसी प्रकार का शोषण नहीं हो. उन्होंने स्पष्ट किया है कि वर्ग में वर्ग पैदा करने की इजाजत न्यायालय द्वारा नहीं दी जा सकती. पटना उच्च न्यायालय का न्याय निर्णय राज्य के नियोजित शिक्षकों छात्रों और शिक्षा के हित में एक ऐतिहासिक फैसला है. इस फैसले ने इस आशंका और संदेह को खारिज कर दिया है, कि न्यायालय में सामान्य नागरिक को न्याय प्राप्त नहीं होता. बल्कि फैसले से प्रमाणित हो गया है कि विधि के समक्ष देर हो सकती है किंतु अंधेर नहीं. बावजूद इसके सरकार उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर कर न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले से मुकर रही है. वह यह भी साबित करने की कोशिश कर रही है, कि नियोजित शिक्षकों को समान कार्य के लिए समान वेतनमान लागू करने से विकास की योजनाएं प्रभावित होंगी, जो सिर्फ आंकड़ों का खेल है. संघ ने उच्चतम न्यायालय में कैविएट दाखिल करने आए निर्णय की सुरक्षा की लड़ाई शुरू कर दी है. लेकिन संघर्ष प्रखर होगा. साथियों को समझ, एकता और विश्वास के साथ लड़ाई लड़नी होगी. हड़बड़ी और छल, छद्म का सहारा लेने वालों से बचना होगा. क्योंकि
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध.
(बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष केदारनाथ पांडेय से बातचीत पर आधारित)

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