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डी-सील के नाम पर एक लाख रूपए की मांग व्यापारी की प्रताड़ना- जगदीश ममगांई

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सांकेतिक चित्र
संवाददाता.
नई दिल्ली. 13 मार्च. दिल्ली नगर निगम की निर्माण समिति के पूर्व चेयरमैन व अर्बन मामलों के विशेषज्ञ जगदीश ममगांई ने कहा है, कि बीते तीन महीने में 4500 के आसपास रिहायशी व व्यवसायिक इकाईयों की सीलिंग की गई, लेकिन किसी भी इकाई की डी-सील प्रक्रिया नहीं की गई है. ममगांई ने कहा कि रिहायशी इलाकों में व्यवसायिक दुरूपयोग न करने का शपथपत्र देने एवं कन्वर्जन शुल्क का बकाया भुगतान कर देने वाली व्यवसायिक इकाइयों की भी सील नहीं खोली जा रही है. मॉनिटरिंग कमेटी व नगर निगम इकतरफा कार्रवाई कर सीलिंग तो कर रहे हैं, लेकिन राहत नहीं दे रहे. उल्टा डी-सील के लिए आवेदन करने वालों से एक लाख रूपए की मांग की जा रही है, जो मॉनिटरिंग कमेटी व निगम की कार्रवाई गलत साबित होने के बावजूद वापस नहीं किए जाएंगे. क्या यह संविधान में प्रदत सबको समान न्याय के अवसर के मौलिक अधिकार के विरूद्ध नहीं है?
jagdish mamgain
ममगांई ने कहा कि कई जगह नगर निगम पर गलत सीलिंग के आरोप लगे हैं. ऐसे मामलों में तुरंत जांच होनी चाहिए और सरकारी एजेंसी की गलती पाए जाने पर संपत्तिधारक को हुए नुकसान का संपूर्ण मुआवजा दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि मॉनिटरिंग कमेटी व नगर निगम द्वारा जांच एवं डी-सील के नाम पर एक लाख रूपए शुल्क मांगना, आर्थिक दंश झेलते व्यापारियों के जख्मों को कुरेदना है. यही कारण है, कि लगभग 4500 सील इकाईयों में 8-10 ने ही एक लाख का भुगतान कर डी-सील के लिए आवेदन किया है, क्योंकि कई दिनों से दुकान सील होने के कारण अधिकतर व्यापारियों की आर्थिक स्थिति तंग है. ममगांई ने कहा कि यह भी निर्देश दिए गए हैं कि डी-सील उन्हीं इकाईयों को किया जाएगा, जिनकी बिल्डिंग व फ्लोर के नक्शे पारित होंगे तथा भवन अधिनियम की सभी शर्तें पूरी करेगा. उन्होंने कहा कि जब दिल्ली में 90 प्रतिशत से अधिक बिल्डिंग अनधिकृत हैं तो यह शर्त पूरी करना कैसे मुमकिन है? केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय व डीडीए द्वारा अधिसूचित 2538 सड़कों विशेषकर मिक्स लैंड यूज पर अधिकतर रिहायशी क्षेत्र के व्यवसायिक प्रतिष्ठान अवैध निर्मित बिल्डिंगों में ही हैं तो उनसे कन्वर्जन शुल्क क्यों लिया, चलाने की अनुमति क्यों दी गई? यह भी पढ़ें : एसएससी स्कैम पर प्रदर्शनकारी छात्रों को कांग्रेस का समर्थन  इस अवसर पर ममगांई ने केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली विकास प्राधिकरण अधिनियम 1957 के 11 (क) के अंतर्गत मास्टर प्लान 2021 में संशोधन संबंधी हलफनामें को दिल्ली में सीलिंग से स्थायी राहत की दृष्टि में कमजोर कोशिश बताया. उन्होंने कहा कि पहले तो 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय व डीडीए ने मास्टर प्लान 2021 में प्रस्तावित संशोधनों का दिल्ली के पर्यावरण व इन्फ्रास्ट्रचर पर पड़ने वाले असर की स्टडी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का वायदा किया, लेकिन आज मास्टर प्लान 2021 में संशोधन को दिल्ली विकास प्राधिकरण अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त अधिकार का हवाला दे न्यायोचित ठहरा रहे हैं. जब आपके पास अधिकार है तो 9 मार्च को जनसुनवाई के उपरान्त अधिसूचना क्यों नहीं जारी की? सुप्रीम कोर्ट ने चूंकि दिल्ली सरकार से भी हलफनामा मांगा है, केन्द्र व दिल्ली सरकार के हलफनामें में एकरूपता रहे इसलिए सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करने से पूर्व केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय व डीडीए को दिल्ली सरकार को भी भरोसे में लेना चाहिए था.

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