Home Astro कुंडली में पंचम स्थान पर निर्भर है संतान सुख…

कुंडली में पंचम स्थान पर निर्भर है संतान सुख…

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सांकेतिक चित्र
एस्ट्रो टिप्स.
पंचम स्थान संतान का होता है. वही विद्या का भी माना जाता है. पंचम स्थान कारक गुरु और पंचम स्थान से पंचम स्थान (नवम स्थान) पुत्र सुख का स्थान होता है. पंचम स्थान गुरु का हो तो हानिकारक होता है.
सिंह लग्न में पंचम गुरु, वृश्चिक लग्न में मीन का गुरु स्वग्रही हो तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है, परन्तु गुरु की पंचम दृष्टि हो या पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो, तो संतान सुख उत्तम मिलता है.
आचार्य नवराज पंत
पंचम स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो तो प्रथम संतान के बाद पिता का भाग्योदय होता है. यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो उसकी पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र अत्यंत प्रभावशाली होता है. मंगल की यदि चतुर्थ, सप्तम, अष्टम दृष्टि पूर्ण पंचम भाव पर पड़ रही हो, तो पुत्र अवश्य होता है.
पुत्र संततिकारक चंद्र, बुध, शुक्र यदि पंचम भाव पर दृष्टि डालें तो पुत्री संतति होती है. यदि पंचम स्थान पर बुध का संबंध हो और उस पर चंद्र या शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो तो वह संतान होशियार होती है. पंचम स्थान का स्वामी शुक्र यदि पुरुष की कुंडली में लग्न में या अष्टम में या तृतीय भाव पर हो एवं सभी ग्रहों में बलवान हो तो निश्चित तौर पर लड़की ही होती है. पंचम स्थान पर मकर का शनि कन्या संतति अधिक होती है. कुंभ का शनि भी लड़की देता है. पुत्र की चाह में पुत्रियाँ होती हैं. कुछ संतान नष्ट भी होती हैं. पंचम स्थान पर राहु या केतु हों तो पितृदोष, दैविक दोष, जन्म दोष होने से भी संतान नहीं होती. यदि पंचम भाव पर पितृदोष या पुत्रदोष बनता हो, तो उस दोष की शांति करवाने के बाद संतान प्राप्ति संभव है. पंचम स्थान पर नीच का सूर्य संतान पक्ष में चिंता देता है. पंचम स्थान पर नीच का सूर्य आॅपरेशन द्वारा संतान देता है. पंचम स्थान पर सूर्य मंगल की युति हो और शनि की दृष्टि पड़ रही हो तो संतान की शस्त्र से मृत्यु होती है. पंचम स्थान पर स्वामी जितने ग्रहों के साथ होगा, उतनी संतान होंगी. जितने पुरुष ग्रह होंगे, उतने पुत्र और जितने स्त्रीकारक ग्रहों के साथ होंगे, उतनी संतान लड़की होंगी. सप्तमांश कुंडली के पंचम भाव पर या उसके साथ या उस भाव में कितने अंक लिखे हैं, उतनी संतान होगी. एक नियम यह भी है, कि सप्तमांश कुंडली में चंद्र से पंचम स्थान में जो ग्रह हो एवं उसके साथ जितने ग्रहों का संबंध हो, उतनी संतान होगी.
संतान सुख कैसे होगा, इसके लिए भी हमें पंचम स्थान का ही विश्लेषण करना होगा. पंचम स्थान का मालिक किसके साथ बैठा है, यह भी जानना होगा. पंचम स्थान में गुरु शनि को छोड़कर पंचम स्थान का अधिपति पाँचवें घर में हो तो संतान संबंधित शुभ फल देता है. यदि पंचम स्थान का स्वामी आठवें, बारहवें घर में हो तो संतान सुख नहीं होता. यदि हो भी तो सुख मिलता नहीं. या तो संतान नष्ट होती है या अलग हो जाती है. यदि पंचम स्थान का अधिपति सप्तम, नवम, ग्यारहवें, लग्नस्थ, द्वितीय में हो तो संतान से संबंधित सुख शुभ फल देता है. द्वितीय स्थान के स्वामी ग्रह पंचम में हो तो संतान सुख उत्तम होकर लक्ष्मीपति बनता है. यह भी पढ़ें : जानिए कब होगा आपका भाग्योदय..? पंचम स्थान का अधिपति छठे में हो तो दत्तक पुत्र लेने का योग बनता है. पंचम स्थान में मीन राशि का गुरु कम संतान देता है. पंचम स्थान में धनु राशि का गुरु हो तो संतान तो होगी, लेकिन स्वास्थ्य कमजोर रहेगा. गुरु का संबंध पंचम स्थान पर संतान योग में बाधा देता है.
पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक राशि हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो पुत्र संतान सुख नहीं होता. पंचम स्थान पर पड़ा राहु गर्भपात कराता है. यदि पंचम भाव में गुरु के साथ राहु हो तो चांडाल योग बनता है और संतान में बाधा डालता है, यदि यह योग स्त्री की कुंडली में हो तो. यदि यह योग पुरुष कुंडली में हो तो संतान नहीं होती. नीच का राहु भी संतान नहीं देता. राहु, मंगल, पंचम हो तो एक संतान होती है. पंचम स्थान में पड़ा चंद्र, शनि, राहु भी संतान बाधक होता है. यदि योग लग्न में न हो तो चंद्र कुंडली देखना चाहिए. यदि चंद्र कुंडली में यह योग बने तो उपरोक्त फल जानें.
पंचम स्थान पर राहु या केतु हो तो पितृदोष, दैविक दोष, जन्म दोष होने से भी संतान नहीं होती. यदि पंचम भाव पर पितृदोष या पुत्रदोष बनता हो तो उस दोष की शांति करवाने के बाद संतान प्राप्ति संभव है. पंचम स्थान पर नीच का सूर्य संतान पक्ष में चिंता देता. पंचम स्थान पर नीच का सूर्य आपरेशन द्वारा संतान देता है. पंचम स्थान पर सूर्य मंगल की युति हो और शनि की दृष्टि पड़ रही हो तो संतान की शस्त्र से मृत्यु होती है.
(आचार्य नवराज पन्त, 9810385078)

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