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विकास नहीं… अब उपवास से आस…

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सांकेतिक चित्र
 संदीप त्यागी.
नई दिल्ली. 12 अप्रैल. देश में कई मोर्चे पर घिरी केंद्र सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी ने संसद में विपक्ष के व्यवधान को बड़ा मुद्दा बनाते हुए एक दिन के उपवास का फैसला किया तो कई सवाल उठ खड़े हुए. मास्टर स्ट्रोक के तौर पर खेला गया यह दांव इस बार उतना कारगर नहीं दिखा, बल्कि इसने सरकार को ही सवालों के घेरे में ले लिया. इससे ठीक एक दिन पहले कांग्रेस एक सांकेतिक उपवास में अपनी नाक कटवा चुकी थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ देश भर के भाजपा जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व में इस एक दिवसीय उपवास के आह्वान के बारे में किसी भाजपा कार्यकर्त्ता ने तो यह जानने-बूझने की जहमत नहीं उठाई, कि देश-विदेश में अपनी उपलब्धियों का डंका पीटने वाली 56 इंची सरकार को आखिर इस उपवास की जरूरत क्यूं पड़ी? लेकिन इस उपवास के बाद कई सवाल खड़े हो गये कि देश में 30 साल के बाद निर्णायक प्रचंड बहुमत के साथ सरकार में आए नरेंद्र मोदी पर क्या मुट्ठी भर विपक्षी सांसद इतने हावी हो गए हैं, कि वह नरेंद्र मोदी को शासन नहीं करने दे रहे? दूसरे एक सवाल यह भी है, कि संसद चलाने की जिम्मेदारी किसकी है, विपक्ष की या फिर सरकार की? यूपीए सरकार के वक्त एक बार भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा था, कि संसद सुचारू रूप से चलाना सरकार की जिम्मेदारी है. सरकर संसद को कैसे चलाए, यह विपक्ष का काम नहीं है. यही नहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा धरने पर बैठने के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने कहा था कि यह सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है. अगर सरकार ही धरने पर बैठ जाएगी तो फिर काम कौन करेगा? यही सवाल आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी किया जा सकता है. हैरानी की बात यह भी है, कि सत्ताधारी दल और प्रधानमंत्री यह नहीं बताते कि सदन में इतना प्रचंड बहुमत होने के बावजूद आखिरकार ऐसे बद्तर हालात क्यों हैं, कि संसद का सत्र तक चलाने में सरकार नाकाम है. देश की राजनीति में उपवास और धरने प्रदर्शनों की परंपरा बहुत पुरानी है. हालांकि यह अलग बात है कि अब यह ज्यादातर सिर्फ सांकेतिक ही रह गए हैं और उपवास तो लगभग पूरी तरह बनावटी ही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी मुद्दे को इवेंट बनाने की यह राजनीति आज ही कर रहे हैं, ऐसा नहीं है. प्रधानमंत्री इस तरीके की राजनीति के माहिर माने जाते हैं. ऐसा भी नहीं है, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में रहते हुए ऐसा उपवास पहली बार कर रहे हैं. इससे पहले नर्मदा डैम को लेकर वर्ष 2006 में तब तत्कालीन मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने उपवास किया था. इसके अलावा भी उन्होंने वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव की तैयारियों से पहले तीन दिवसीय उपवास किया था. जिसे सदभावना उपवास का नाम दिया गया था. जिस पर हुए खर्च को लेकर खासा बवाल भी हुआ था. हालांकि अगर बीते कुछ वर्षों में उपवास की इस राजनीति से किसी नतीजे की बात की जाये तो वर्ष 2006 में ममता बनर्जी का सिंगूर में किसानों के लिए किया गया 25 दिन का अनशन, वर्ष 2009 में टीआरएस के चंद्रशेखर राव द्वारा राज्यों को विभाजित करने के संदर्भ में किया गया अनशन ही किसी सार्थक परिणाम तक पहुंचा है. अन्यथा तो यह एक सांकेतिक इवेंट ही बनकर रह जाता है. देश में विभिन्न मुद्दों पर चौतरफा घिरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह विक्टिम कार्ड खेला जरूर है, लेकिन ज्यादातर लोगों के दिमाग में यह सवाल है, कि अब विकास की बात छोड़कर प्रधानमंत्री उपवास की बात क्यूँ कर रहे हैं? क्या यह अपनी विफलताओं से ध्यान हटाने का एक तरीका है? उससे भी बड़ा सवाल यह है, कि अगर पूर्ण बहुमत के बाद भी सरकार संसद चलाने और अपनी नीतियां लागू करने में अक्षम साबित होती है, तो जनता इसमें क्या कर सकती है?

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