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कहीं जी का जंजाल न बन जाये बजट की लिमिट लांघना ..?

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सांकेतिक चित्र
गिरीश की कलम से-
Girish Sharma, Property Conslutant
एक अदद घर का सपना तो हर किसी का ही होता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर घर खरीदना चाहते हैं तो रुपया तो चाहिए ही. आज की युवा पीढ़ी नौकरी लगते ही एक अदद घर बनाने की सोचने लगती है.जिंदगी में हर काम फटाफट कर लेने की चाह उसे इस काम को करने के लिए प्रेरित करती है. जबकि पुरानी पीढ़ी की सोच एकदम अलग थी. पुरानी पीढ़ी रिटायरमेंट के आस-पास के समय में सोचना शुरू करती थी, कि रिटायर होने से पहले अपना मकान बना लेना चाहिए. क्योंकि उस समय एकमुश्त रुपया रिटायरमेंट पर ही मिलता था. हमारे बड़ों की सोच के अनुसार घर ऐसा होना चाहिए जिसमें जमीन भी अपनी हो और छत भी. अर्थात प्लॉट लेकर मकान बनाना. और अब नई पीढ़ी इस तरह की महत्वाकांक्षा से हटकर ऐसा घर खरीद रही है, जिसमें भले जमीन और छत ना हो बीच का हो. लेकिन सिंगल गेटिड होने के साथ-साथ हर तरह की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हों. उसके लिए भले कितना भी और कितने समय के लिए लोन लेना पड़े.  यह भी पढ़ें : व्यापारी हलकान, क्या हो सीलिंग का समाधान..? उसकी फिक्र नहीं. इसका एकमात्र कारण है योग्य युवाओं की बढ़ती आय, जिसके चलते वह अपनी सेविंग्स का 50 प्रतिशत तक डाउन पेमेंट देने में हिचकिचाते नहीं, जबकि बैंक प्रॉपर्टी की कीमत का 80 से 85 प्रतिशत तक ही लोन देते हैं. अब विश्लेषण की बात यह है, कि पुरानी सोच ठीक थी या आज की युवा सोच. मेरी राय में पुरानी सोच हमेशा दूरंदेशी वाली रही. और उनका मानना था, कि जीवन में आपतकालीन स्थिति आने पर कुछ जमा-पूंजी अपने पास होना अति आवश्यक है. जिससे कि परिवार का भविष्य सुरक्षित रहे. जबकि उस समय की कहावत इससे बिल्कुल उलट थी कि-
पूत सपूत तो क्यों धन संचय
पूत कपूत तो क्यों धन संचय
कमोवेश पुरानी पीढ़ी की इस कहावत को आज की युवा पीढ़ी साकार कर रही है. वह भविष्य के लिए जमा पूंजी इकट्ठा करने में विश्वास नहीं रखती. पाश्चात्य देशों की ही तरह सप्ताह में 5 दिन की कमाई आखिरी 2 दिन में मौज-मस्ती में खपा देने में विश्वास करती है. इसी कारण नई पीढ़ी कभी-कभार ईएमआई, लोन और टैक्सों के बोझ तले डिप्रेशन में भी चली जाती है. जिसका परिणाम कभी-कभी बहुत घातक सिद्ध होता है. इस डिप्रेशन के कारण दांपत्य जीवन में दरारें पड़ने लगती हैं. कभी-कभार तो यह गले की फांस बन जाता है. मेरी युवा पीढ़ी को छोटी सी नसीहत है, कि नौजवानों आपकी जितनी चादर है उतने ही पैर पसारें. इस समय आपको अपना बजट लांघना आने वाले कुछ महीनों बल्कि सालों के चैन को प्रभावित कर सकता है. मेरा मानना है, कि यदि पुरानी पीढ़ी की दूरंदेशी और नई पीढ़ी के उत्साह और तुरंत निर्णय का तालमेल हो जाए तो भावी पीढ़ी बिना किसी डिप्रेशन के एक खुशनुमा और सुकून भरा जीवन बिता सकती है.
गिरीश शर्मा के पिछले लिखे लेखों को पढ़ने के लिए आप उनके फेसबुक पेज Shanti Properties (Regd.) पर जाकर देख सकते हैं. और समय लेकर मिल भी सकते हैं.

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