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सब कुछ खत्म होने के बाद चेतेंगी सरकारें..?

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संदीप त्यागी.
राजधानी दिल्ली बीते 1 हफ्ते से भयंकर प्रदूषण की मार से बेहाल है. शुरूआती कुछ दिनों में इसे बेहद हल्के में लेने वाले राजनीतिक दल उस वक्त जागे जब चीजें लगभग काबू से बाहर हो चली थीं. और अब उस वक्त का इंतजार कर रहे हैं, जब तक चीजें खुद-ब-खुद ठीक न हो जायें. इस एक हफ्ते के अंदर राजधानी दिल्ली गैस चैंबर में तब्दील हो गई. जब हर तरफ हाहाकार मचने की स्थिति आ गई और राजनीतिक पार्टियों और उसके नुमाइंदों को लगने लगा कि अब इसे इग्नोर नहीं किया जा सकता है, तो इस पर आपसी खींचतान शुरू हो गई. राजधानी दिल्ली में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच वाक युद्ध शुरू हो गया. भाजपा राजधानी में प्रदूषण के लिए आम आदमी पार्टी को जिम्मेदार ठहरा रही है, जबकि आम आदमी पार्टी भाजपानीत निगम और केंद्र सरकार पर सवाल खड़े क्या कर रही है. बीच-बीच में रही-सही कसर हाशिए पर पड़ी हुई कांग्रेस भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है और याद दिला रही है, कि उसके वक्त में सब कुछ ठीक-ठाक था, हालात अब ज्यादा खराब हुए हैं, जिसके लिए मौजूदा दोनों सरकारें जिम्मेदार हैं. राजधानी में बीते कुछ वर्षों से बढ़ता स्मॉग शायद इस बार सबसे ज्यादा था. स्थिति इतनी गंभीर कि राज्य सरकार ने अपने स्कूलों की एक हफ्ते की छुट्टियां कर दी.  यह भी पढ़ें : बच्चों, बूढ़ों और बीमारों के लिए जानलेवा हो सकता है स्मॉग, अब देखने का नहीं चेतने का वक्त लोगों को बाहर निकलने के लिए एडवाइजरी जारी कर दी. यानी कि सरकारी तंत्र को बखूबी पता है, कि लगभग 1 हफ्ते तक हालात सामान्य होने वाले नहीं हैं. लेकिन उसके बावजूद भी राजनीतिक स्तर पर इस विभीषिका से निपटने के लिए क्या किया जा सकता है, यह देखने को कुछ भी नहीं मिला. देश भर में स्वच्छा अभियान और नया इंडिया बनाने वाली भाजपा की केंद्र सरकार इस पूरे मामले पर मुँह सिलकर बैठ गई और दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार घूम-फिरकर अपने रामबाण इलाज आॅड-ईवन पर आ गई. वह भी इस उम्मीद के साथ कि विपक्षी दलों का विरोध और एनजीटी की दलीलें इसे बमुश्किल एक हफ्ता चलने देंगे. लेकिन एनजीटी ने इस बार कोई ढील ना बरतते हुए गेंद सरकार के पाले में ही डाल दी. राजधानी में दोपहिया वाहनों और महिलाओं को भी आॅड ईवन की जद में लाते हुए एनजीटी ने साफ कर दिया कि सिर्फ प्रतीकात्मक आॅड-ईवन से अब बात नहीं बनने वाली है, सरकार को आॅड-ईवन भी पूरा लागू करना होगा. इसके बाद की कहानी सरकारों की लाचारगी की कहानी है, कि देश की राजधानी में दो-दो पूर्ण बहुमत की सरकारें तीन साल बाद भी मिलकर हालात ऐसे नहीं कर पाई हैं, कि किसी प्राकृतिक आपदा के समाधान हेतु सात से दस दिन के अंदर भी कोई समाधान तलाश सकें. प्रेस कांफ्रेंस करके, एक-दूसरे को गरियाकर और एनजीटी के चक्कर लगाने के बाद राजनैतिक दलों और सरकारों के पास इस समस्या का समाधान यह है, कि राजधानीवासी और सरकारें बारिश का इंतजार कर रही हैं. जिसके बाद हालात सामान्य हो जाने की उम्मीद हैं. हम अक्सर बड़े भूकंप और एटमी हमले के बाद सुरक्षित रहने के लिए बरती जाने वाली सावधानियों पर काफी कुछ सुनते रहते हैं. लेकिन जो देश बढ़ते प्रदूषण के कारण छोटी सी राजधानी में पैदा हुई समस्या का समाधान नहीं तलाश सकता, उस देश में बड़े भूकंप, एटमी हमले समेत अन्य प्राकृतिक आपदाओं पर होने वाली चर्चाओं का सच क्या होगा, समझा जा सकता है!

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