Home National News चुनाव के पहले चरण में लड़खड़ाती बीजेपी को मिला बालकोट एयरस्ट्राइक व...

चुनाव के पहले चरण में लड़खड़ाती बीजेपी को मिला बालकोट एयरस्ट्राइक व पुलवामा का सहारा..!

74
0
SHARE
सांकेतिक चित्र
11 अप्रैल को चुनावी यात्रा के पहले वोट के साथ ही वर्ष 2019 में केन्द्र में नई सरकार के गठित होने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. पहले चरण में 91 लोकसभा क्षेत्रों में मतदान हुआ. मत-केन्द्रों में मतदाताओं के रूझान और चर्चा को समझने वाले राजनैतिक विशेषज्ञ इस बात पर एकमत नजर आए कि बालकोट एयरस्ट्राइक व पुलवामा हत्याकांड की पीठ पर सवार बीजेपी चुनाव में अपने पक्ष में माहौल बनाने में सफल हुई है. कैसा दुर्भाग्य है, कि सरकार की खुफिया विफलता के चलते 40 जवान बेमौत मारे गए और अपनी विफलता को राष्ट्रवाद की ढाल बना बीजेपी वोटों की फसल उगा रही है. देश की जनता अद्भुत है, विषधर नाग जिसकी फितरत डसना व जीवन हरण करना है, उसे भी
jagdish mamgain. Bjp Leader
नागपंचमी पर दूध पिलाकर उसके स्वास्थ्यवर्धन की कामना करती है. मोदी सरकार के प्रति सत्ता विरोधी लहर तो नजर नहीं आई, लेकिन बेरोजगार युवाओं एवं किसानों में असंतोष तथा 2014 में मोदी के नाम पर जीते सांसदों की अकर्मण्यता जरूर बीजेपी को भारी पड़ने वाली है. इन क्षेत्रों में 2014 में बीजेपी को 32 सीटों पर और उनके सहयोगियों को 22 सीटों पर यानि एनडीए गठबंधन को इन 91 सीटों में से 54 पर विजय मिली थी. 2019 में टीडीपी अब एनडीए के कुनबे से नाता तोड़ चुकी है. पहले चरण के मतदान तक मोदी सरकार के विकास के दावे तो चुनावी परिदृश्य से नदारद नजर आए लेकिन सैन्य अभियान का अभिमान रंग लाया है. और पुराने आंकडे तक पहुंचने में हांफती बीजेपी कुछ हद तक संभलती नजर आई है. अनुमान है, कि पहले चरण के 91 लोकसभा क्षेत्रों में बीजेपी 20-22 व सहयोगी 3-4 सीट हासिल कर सकते हैं. काँग्रेस की स्थिति में सुधार हो सकता है और वह पिछली बार प्राप्त 7 सीट के मुकाबले इस बार 10-12 व सहयोगी यूपीए के घटक जो 1 पर थे 4 सीट पा सकते हैं. एनडीए व यूपीए के अलावा अन्य जिनके पास वर्ष 2014 में 29 सीट थी, उनका आंकड़ा उछलकर 50 सीट तक पहुंच सकता है.
लेकिन चुनाव से इतर यह कैसा दुर्भाग्यपूर्ण है, कि पारदर्शिता का ढोल पीटने वाले चौकीदार नरेन्द्र मोदी की सरकार राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता की आवश्यकता पर सुप्रीम कोर्ट में कहती है, कि मतदाताओं को यह जानने की क्या जरूरत है, कि राजनीतिक दलों के पास धन कहाँ से आ रहा है? सरकार ने चेताया कि पारदर्शिता की खातिर बेनामी चुनावी बॉन्ड को कोर्ट बंद नहीं कर सकता. अदालत को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. कोर्ट ने पूछा था, कि मतदाताओं को यह नहीं पता होना चाहिए कि किस पार्टी को कौन धन दे रहा है? अगर धन प्रदाता गुमनाम रहेगा तो काले धन को दूर करने की पूरी कवायद विफल होगी. नकदी के माध्यम से राजनीतिक फंडिंग में तो परदेदारी थी ही, अब चुनावी बांड के माध्यम से डोनर गुमनाम ही रहेगा. इससे पहले चुनाव आयोग ने अदालत में बयान दिया कि उम्मीदवार के बारे में जानना ही मतदाताओं का अधिकार नहीं है, बल्कि मतदाताओं को यह जानने का भी अधिकार है, कि उन उम्मीदवारों को खड़ा करने वाले दलों के धन के स्रोत क्या हैं, कौन लोग उन पर पैसा लगा रहे हैं? वैसे भी राजनीतिक दलों के खर्च करने की कोई सीमा नहीं है. आज सत्तारूढ़ मोदी सरकार के बेनामी चुनावी बॉन्ड जिसमें देने वाला गुमनामी रहता है पर रोक लगाने संबंधी अंतरिम याचिका पर सुप्रीम कोर्ट पर फैसला आ सकता है. यह भी पढ़ें : 2019 में 2014 के अपने वायदों को दोहरा रही है भाजपा..! दूसरी तरफ मोदी एंड कंपनी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के पूर्व ओएसडी पर आयकर छापे में 9 करोड़ रूपए की रकम प्राप्त होने की बात कह कांग्रेस को भ्रष्टाचार पर घेर रही है, जो सही है. पर तेलंगाना पुलिस द्वारा बीजेपी कर्मियों से 8 करोड़ रूपए नकद पकडे जाने पर चुप क्यों है? अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के काफिले से जब्त की गई 1.8 करोड़ रुपये की नकदी पर भी चुप है. 1 करोड़ रुपये जिस वाहन से जब्त किए गए उसे बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री पेमा खांडू के उम्मीदवार बेटे डांगी परम का बता पल्ला झाड़ा है. लेकिन जब चुनाव में उम्मीदवार के खर्च की सीमा 70 लाख है, तो एक करोड़ की नकदी कैसे थी, दूसरे वाहन से भी 80 लाख रुपये जब्त किए गए! आम जनता पर तो ज्यादा कैश रखने पर पाबंदी है और डिजिटल भुगतान की प्रधानमंत्री मोदी वकालत करते रहते हैं, लेकिन बीजेपी नेताओं के लिए सब कुछ जायज है. वैसे भी आयकर विभाग व ईडी सत्तारूढ़ मोदी एंड कंपनी पर छापा डालने की हिम्मत तो कर नहीं सकता है और न ही यह पूछ सकता है कि दिल्ली के मुख्य कार्यालय सहित देश भर में बीजेपी ने लगभग 350 कार्यालय निर्मित करने पर हजारों करोड़ कहाँ से आए?
चौकीदार नरेन्द्र मोदी की नजर में वर्ष 2003 में पार्टी में आई स्मृति ईरानी, जिन्होंने बीजेपी को खड़ा करने में कथित मजबूत भूमिका निभाई है. अपनी शिक्षा के बारे में बोले गए झूठ पर बेनकाब हो गई हैं. गोद लिए गांव के विकास नाम पर एमपी फंड के लगभग 5 करोड़ रूपए पर हाथ साफ कर गई. पति की कंपनी पर मध्य प्रदेश में रिकार्ड में हेर-फेर कर स्कूल के खेल के मैदान की जमीन हथियाने का आरोप है. पर मोदी एंड कंपनी को उनका भ्रष्टाचार पार्टी को मजबूत करने की कवायद नजर आती है.
(जगदीश ममगांई, लेखक वरिष्ठ भाजपा नेता हैं)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here