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बिल्डिंग बायलाज में बदलाव के लिए अध्यादेश लाये सरकार

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सांकेतिक चित्र
विशेष संवाददाता.
नई दिल्ली. 17 जनवरी. दिल्ली नगर निगम की निर्माण समिति के पूर्व चेयरमैन जगदीश ममगांई ने अवैध निर्माण पर कार्रवाई पर लगी अस्थायी रोक पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा सवालिया निशान लगाए जाने पर चिन्ता जताई है. ममगांई ने सरकार से बिल्डिंग बायलाज में बदलाव हेतु अध्यादेश लाये जाने की मांग करते हुए कहा है, कि वर्ष 2007 में यूपीए सरकार के केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने अनधिकृत कॉलोनी, गांव एवं झुग्गी-झोपडी क्षेत्र में हुए अवैध निर्माण पर एक वर्ष के लिए कार्रवाई रोकने के लिए अधिसूचना जारी की थी, तबसे लगातार कभी एक वर्ष तो कभी तीन वर्ष तक कार्रवाई पर अस्थायी रोक लगती रही, लेकिन स्थायी समाधान के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हुए. उन्होंने कहा कि वर्ष 2007 में 8 फरवरी 2007 तक बने अवैध निर्माण पर कार्रवाई को अस्थायी संरक्षण मिला, जो बढ़ते-बढ़ते अब 30 जून 2014 तक बने अवैध निर्माण पर कार्रवाई रोकने तक पहुंच गया. इससे पता चलता है, कि किसी भी दल की केन्द्र सरकार अवैध निर्माण पर अंकुश लगाने को तैयार नहीं है.
jagdish mamgain
ममगांई ने कहा कि मौजूदा दौर में हर किसी को लगता है, कि नगर निगमकर्मियों से सांठ-गांठकर कैसा भी अवैध निर्माण कर लिया जाये, राजनैतिक कारणों से कार्रवाई तो होगी ही नहीं. इससे भूमाफिया के हौंसले बुलंद हुए हैं. उन्होंने कहा कि इन अवैध कॉलोनियों में रहने वालों के मन में डर बनाए रख राजनैतिक दल वोट बैंक बनाए रखना चाहते हैं.
ममगांई ने कहा कि अवैध निर्माण करने व सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा कर बेचने में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने एवं अंकुश लगाने के प्रति नगर निगमों व सरकारी एजेंसियों की शिथिलता के कारण ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (विशेष प्रावधान) को दिसम्बर 2020 तक विस्तार देने व अवैध निर्माण पर कार्रवाई की कट आॅफ डेट 8 फरवरी 2007 से 30 जून 2014 तक करने के औचित्य को केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में स्थापित करने में कमजोर साबित हो रही है. वर्तमान में दिल्ली में निर्मित 44 लाख से अधिक आवासीय व व्यवसायिक इकाईयों में से करीब दो लाख के करीब के ही नक्शे पारित हैं. इतने बडेÞ पैमाने पर हुए अवैध निर्माण पर कोई कार्रवाई न होने से बिल्डर माफिया व सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों ने पूरी दिल्ली को स्लम में तब्दील कर दिया है. उन्होंने कहा कि अप्रैल 2006 में दिल्ली हाई कोर्ट ने अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों एवं व्यक्तियों को नामजद कर कार्रवाई करने हेतु सीबीआई जांच के आदेश दिए थे, लेकिन आज तक किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. ममगांई ने कहा कि अवैध व्यवसायिक गतिविधियों पर कार्रवाई रोकने हेतु वर्ष 2007 में ऐसे ही सड़कों को अधिसूचित कर राहत देने के अस्थाई प्रबन्धन किया गया, लेकिन दोबारा सीलिंग प्रारम्भ होने से इसकी कलई खुल गई है. यह भी पढ़ें : त्रिनगर विधानसभा में नवनिर्वाचित सांसद संजय सिंह का सम्मान समारोह, संघर्ष के शुरूआती दौर को याद किया  ममगांई ने कहा कि 351 अतिरिक्त सड़कों को व्यवसायिक गतिविधियों के लिए अधिसूचित करने पर तो नगर निगम व दिल्ली सरकार आपसी रस्साकशी करने में लगे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में तो पूर्ववर्ती 2534 अधिसूचित सड़कों की वैधानिकता पर ही सवाल उठ रहा है. 28 अगस्त 2007 के आदेश के मद्देनजर तो 140 अधिसूचित सड़कों को निरस्त करना पड सकता है. दिल्ली में लागू भवन उपनियम में ग्राउंड कवरेज में कोई छूट नहीं, सब डिवीजन प्लाट व मिले हुए प्लाटों पर निर्माण की अनुमति नहीं है. भवन उपनियम नौकरशाहों द्वारा बनाए गए, इसमें जनता को राहत प्रदान करने की व्यवहारिक सोच नहीं है. डीडीए द्वारा समय-समय पर मास्टर प्लान 2021 में अधिसूचित किए गए विभिन्न संशोधनों को तक भवन उपनियम में सम्मिलित नहीं किया गया है. दिल्ली के गांवों व फार्म हाऊस समूहों को कम घनत्व वाले आवासीय क्षेत्र के रूप में विकसित करने की अधिसूचना होने के बावजूद क्रियान्वित नहीं हो रही है.

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