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निजी अस्पतालों की लूट कब तक?

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फाइल फोटो
निजी अस्पतालों की लूट कब तक?देश के निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य की दृष्टि से तो हालात बदतर एवं चिन्तनीय हैं ही, लेकिन ये लूटपाट एवं धन उगाहने के ऐसे अड्डे बन गये हैं जो अधिक परेशानी का सबब है. देश में जगह-जगह छोटे शहरों से लेकर प्रान्त की राजधानियों  एवं एनसीआर तक में निजी अस्पतालों में मरीजों से लूट-खसोट, इलाज में कोताही और मनमानापन कोई नई बात नहीं है.
फाइल फोटो, ललित गर्ग
देश के नामी निजी अस्पतालों की श्रृंखला में इलाज एवं जांच परीक्षण के नाम पर जिस तरह से लाखों रुपए वसूले जा रहे हैं, वह तो इलाज के नाम पर जीवन की बजाय जान लेने के माध्यम बने हुए हैं. इसका ताजा उदाहरण है गुरुग्राम का नामी अस्पताल फोर्टिस और उसका सात साल की एक डेंगू-पीड़ित बच्ची के इलाज का सोलह लाख रुपए का बिल. इतनी बढ़ी राशि लेकर भी पीड़ित बच्ची की जान नहीं बचायी जा सकी.  ऐसे महंगे इलाज की फिर क्या उपयोगिता? क्यों इस तरह की सरेआम लूटपाट इलाज के नाम पर हो रही है? डेंगू पीड़ित नन्हीं बच्ची की मौत निजी अस्पतालों पर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण चिकित्सा व्यवस्था पर एक बदनुमा दाग है. इलाज के नाम पर आम आदमी जाये तो कहां जाये? सरकारी अस्पतालों में मौत से जूझ रहे रोगी के लिये कोई जगह नहीं है तो उसके लिये निजी अस्पतालों में शरण जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं? निजी अस्पतालों ने लूट-खसोट मचा रखी है. यहां तक कि इलाज के बगैर भी बिल वसूलने की घटनाएं नजर आती हैं. मरीजों पर महंगे टेस्ट करवाने के लिए दबाव डाला जाता है. बगैर जरूरत मरीज को वेंटिलेशन व आॅपरेशन थियेटर में डाल दिया जाता है. मरीजों को उनके मामले का विवरण नहीं दिया जाता है. तय पैकेज पर एक्सट्रा पैकेज लेने के मामले भी सामने आये हैंै. इससे बड़ा अनैतिक काम और नहीं हो सकता है. फोर्टिस में एक तरफ मरीज के परिवार से  यह भी पढ़ें : सफदरजंग हॉस्पीटल में नेशनल बायोमैटिरियल केन्‍द्र की शुरूआत, केंद्रीय राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने किया उद्घाटन अतिशयोक्तिपूर्ण एवं आश्चर्य में डाल देने वाला बिल वसूला गया, और दूसरी तरफ, उपचार मानकों का पालन भी नहीं किया गया. गुरुग्राम की यह घटना कोई पहली या अकेली घटना नहीं है, इस तरह की न जाने कितनी घटनाएं रोज-ब-रोज निजी अस्पतालों में दोहराई जाती हैं. यह वाकया निजी अस्पतालों की बदनीयति की मिसाल है. लेकिन सरकार, प्रशासन, प्रभावशाली लोगों के संरक्षण की वजह से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता! यहां तक कि अपने को स्वतंत्र कहने वाला मीडिया भी निजी अस्पतालों की अनियमितताओं और कमियों को दिखाने-बताने से परहेज ही करता है. आम आदमी की दो मूलभूत जरूरतें हैं शिक्षा एवं स्वास्थ्य. दोनों की उपलब्धता कराना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन आजादी के सात दशक में पहुंचते-पहुंचते सरकार अपनी इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने लगी है और इसका फायदा निजी अस्पतालों एवं निजी स्कूलों द्वारा उठाया जा रहा है. अधिकांश निजी अस्पतालों एवं निजी स्कूलों  का स्वामित्व राजनीतिकों, पूंजीपतियों और अन्य ताकतवर लोगों के पास होने से उनके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत किसी सामान्य व्यक्ति की कैसे हो सकती है? फोर्टिस अस्पताल के ताजा मामले में स्वास्थ्य मंत्रालय ने जरूर संज्ञान लिया है और उसने सभी प्रदेशों और केंद्रशासित राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र भेज कर अस्पतालों पर कड़ी नजर रखने के निर्देश दिए हैं. सवाल है, कि यह पत्र कोरा दिखावा बनकर रह जायेगा या समस्या के समाधान की दिशा में कारगर साबित होगा? स्वास्थ्य मंत्रालय को ऐसी चिंता तभी क्यों सताती है, जब इस तरह की शर्मनाक एवं गैरकानूनी घटनाएं सुर्खियों में आ जाती है? जबकि बढ़ा-चढ़ाकर बिल बनाना निजी अस्पतालों का रोज का धंधा है. क्या मंत्रालय इससे अनजान रहा है? गुरुग्राम की घटना को एक सबक के तौर पर लेने की आवश्यकता है और ताकि निजी अस्पतालों समेत सभी महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्थानों में गलत कार्य करने पर कड़ी कार्रवाई तय की जाने की स्थितियां बन सकें. लेकिन विडम्बनापूर्ण है कि देश में छोटे-छोटे अपराध एवं गैरकानूनी काम करने वाले के लिये तो सख्त कानून हैं और सरकार भी जागरूक है, लेकिन इन बड़े एवं सभ्य कहे जाने वाले लुटेरों के लिये सन्नाटा है.  ये परिस्थितियां गुनाह करने वाले अस्पतालों के पक्ष में जाती हैं, जिसका फायदा वे उठाते रहते हैं. ऐसे में कानूनों और नियमों का पालन कौन कराएगा?
(ललित गर्ग, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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