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अपराधमुक्त हो भारतीय लोकतन्त्र, पारदर्शी व्यवस्था के लिए जागें मतदाता

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सांकेतिक चित्र
भारतीय लोकतन्त्र दुनिया में सबसे बड़ा लोकतन्त्र है. भारत के लोगों को बेमिसाल स्वतंत्रता एवं समानता के अधिकार प्राप्त हैं. भारत के संविधान में लोकतन्त्र का ढांचा बड़ी कुशलता से दूरगामी सोच के साथ तय किया गया है.
डॉ. रिखबचंद जैन, फाईल फोटो
भारत का चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता, कार्यकुशलता, निर्भीक तथा स्वतंत्र रूप से चुनाव कराने के लिए विश्व विख्यात है. भारत के मतदाताओं ने सूझ-बूझ का परिचय देकर पिछले कई चुनावों में अचंभित कर देने वाले निर्णय देकर अपनी जागरुकता को प्रमाणित किया है. इतना सब कुछ होने के बावजूद भारत के लोकतन्त्र में अनेक विकृतियां घर कर गयी हैं. लोकतन्त्र सच्चा नहीं रहा है. विश्व के लोकतन्त्र की गुणवत्ता में 59वाँ स्थान है.
राजनीतिज्ञ, राजनीति वर्ग, राजनीतिक पार्टियाँ, जनप्रतिनिधि वर्ग, मीडिया सभी शक्ति के केन्द्रों में आपराधिक तत्वों ने कब्जा कर लिया है. प्रत्येक पार्टी के 30 प्रतिशत से अधिक दागी सांसद, विधायक हैं. बिहार विधानसभा में 58 प्रतिशत दागी हैं तो यूपी में 49 प्रतिशत दागी हैं. मंत्री मंडलों में तीस प्रतिशत लोग दागी हैं. इन सब में प्रति वर्ष आपराधिक तत्वों का प्रभाव एवं उपस्थिति प्रतिशत बढ़ता ही जा रहा है. धन-बल का दुरूपयोग स्पष्ट दिखता है. आपराधिकतत्वों ने जनप्रतिनिधित्व का काम सेवा करने से हटा कर व्यवसाय बना लिया है. आपराधिक तत्व धन-बल के जोर से टिकट खरीदकर जनप्रतिनिधि बन जाते हैं और राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पदा जैसे वन, खनिज, उद्योग, व्यापार आदि में अपना आध्पित्य बना लेते हैं. सेवा क्षेत्र जैसे अस्पताल, कॉलेज, स्कूल, विश्वविद्यालय में भी आपराधिक तत्वों ने अधिकतर कब्जे में ले लिए हैं. पुलिस, प्रशासन, राजनैतिक मिली-जुली प्रणाली से राष्ट्रीय सम्पदा का दुरुपयोग कर रहे हैं. भ्रष्टाचार और दुराचार बढ़ रहा है. घूसखोरी ने एक विशेष कला का रुप ले लिया है. यौन शौषण भी घूस का अंग बन रहा है. ऐसे तमाम लोग न्याय प्रणाली को धता बता रहे हैं. जनता, पीड़ितों की आवाज सुनने वाला ही कोई नहीं. सुनने के बाद उसका कोई समाधान नहीं होता है. एक- दो पार्टी को छोड़कर परिवारवाद का बोलबाला है. राजनैतिक पार्टियां तो मात्र भागीदारी पारिवारिक फर्म बनकर रह गयी हैं. करीब 400 परिवार देश की राजनीति, शासन, प्रशासन में अभेद रुप से स्थिर बन गये हैं.  महिला सुरक्षा की बात हो, बलात्कार की आंधी हो, शिक्षा संस्थानों के घोटाले हों, अस्पताल और सावर्जनिक संस्थानों की दुर्व्यवस्था हो, गरीब-शोषित-दलित-खेतिहर-मजदूर-वनवासी-जनजाति सभी गणतंत्र के 67 वर्ष पूरे होने के बाद भी अपने कल्याण की प्रतीक्षा ही कर रहे हैं. शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है. महंगाई, भ्रष्टाचार, अभाव, बेरोजगारी का बोलबाला है.
धन-बल से अपराधी और आपराधिक तत्वों की सक्रियता से जनप्रतिनिधित्व, प्रशासन और सावर्जनिक संस्थानों में सेवाभावी, नि:स्वार्थी, निष्काम, योग्य व्यक्तियों का रास्ता बंद हो रहा है. तथा गलत एवं अवांछित लोगों के लिए सभी तरह के शक्ति केन्द्र सुलभ हो रहे हैं. चीन में 98 प्रतिशत साम्यवादी पार्टी के डेलीगेट ग्रेजुएट हैं. भारत में अनपढ़ को राष्ट्रपति, प्रधनमंत्री, सांसद, विधायक बनने में कोई कानूनी बाधा नहीं है.  चुनावी खर्च इतना ज्यादा है, कि योग्य, ईमानदार चुनाव के रास्ते उस सीमा में खर्च कर जीतने की कोई उम्मीद नहीं रख सकता है. 2-4 करोड़ का स्वामी भी शायद ही चुनावी दंगल में प्रवेश कर सकता है. टिकट के लिए करोड़ों चाहिएं, चुनाव में और करोड़ों खर्च करने पड़ते हैं. राज्यसभा की 1-1 वोट करोड़ों रुपए में खरीदी जा रही हैं. समय-समय पर हॉर्स ट्रेडिंग होती रहती है. करोड़ों के वारे-न्यारे से पार्टियां बदली जाती हैं. पार्टी के पद भी धन बल से लिए जाते हैं. पावर की जगह लेने के लिए धन ही एकमात्र माध्यम रह गया है, योग्यता नहीं. प्रशासनिक तबादले, सरकारी भर्तियां बिना लिए-दिए नहीं होती हैं. तबादलों में करोड़ों का लेन-देन हो रहा है. ऐसे माहौल में देश के अच्छे नागरिक राष्ट्रभक्ति एवं सेवा भावना के साथ जवाहरलाल नेहरु, सरदार पटेल, डॉ. भीमराव अम्बेडर, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, दीनदयाल उपाध्याय, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, गुलजारीलाल नन्दा, डॉ. राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और नरेन्द्र मोदी जैसे व्यक्तित्व कैसे अपना स्थान बना सकते हैं? जरा सोचें!  यह भी पढ़ें : हवा, लहर के झांसे में न आएं मतदाता, अपना अमूल्य वोट किसको दें, कैसे तय करें..? 
भारत के लोकतन्त्र में राजनैतिक पार्टियों के उच्च पदाधिकारी जैसे अध्यक्ष, मंत्री आदि जानबूझ कर, बेरोक-टोक, गलत तरह के आपराधिक तत्वों धन्ना सेठों, घोटालेबाजों को चुनाव लड़ने की टिकट दे देते हैं. यही लोकतन्त्र की सभी विकृतियों की जड़ है. अपराधी कौन? और न्याय प्रक्रिया के किस पायदान पर अपराधी माना जाये? इस पर बहस चल रही है. न्यायप्रणाली की कमजोरियों का फायदा उठाकर अपराधी 20 वर्षों से ज्यादा केस को लटकाये रखते हैं और इस समयावधि में 3-4 बार चुनाव जीतते रहते हैं. एक विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट जल्दी राजनैतिक अपराधों के निपटाने के लिए बनाने हेतु कोर्टका आदेश स्वागत योग्य है. हालांकि 6 वर्ष के लिए अपराधिक लोगों को सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित करने का आदेश दिया, लेकिन उसकी अनुपालना नहीं हो पा रही है. सिंगापुर में मात्र चार हजार डॉलर करीब 30 हजार रुपए से अधिक किसी भी कानूनी उल्लंघन के लिए फाइन देने पर व्यक्ति जीवनपर्यन्त चुनाव में भाग लेने और चुनाव लड़ने से अयोग्य हो जाते हैं. तभी वहां अनुशासन है. भारत में 30 वर्षों से आपराधिक तत्वों पर रोक लगाने के लिए चुनाव आयोग, विधि आयोग, सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न विशेषज्ञों की रिपोर्ट के बावजूद प्रत्येक पार्टी के नेता सावर्जनिक स्थलों पर इसके लिए कानून बनाने की घोषणाएं करते हैं, समर्थन भी करते हैं, लेकिन वास्तव में सदन में विषय लाने से पीछे हट जाते हैं. समाजसेवी अन्ना हजारे के विशाल जन समर्थित आन्दोलन को भी सरकार ने ठेंगा दिखा दिया. लोकपाल की भी नियुक्ति 30-40 सालों से नहीं हो रही है.
पिछले 10-15 साल में जो कुछ चुनाव सुधार, राजनैतिक सुधार हुए हैं, वो कोर्ट के आदेशों से हुए हैं. यहां यह कहना जरुरी है, कि बिना चुनाव सुधार, राजनैतिक सुधार, प्रशासन सुधार एवं पुलिस सुधार के सरकार की गाड़ी सही नहीं चल पाती है. सारी योजनाएं कल्याण कार्यक्रम की गति धीमी रहती है और प्रावधानों का खुलकर दुरूपयोग होता है. चिन्हित, दलित, गरीब, शोषित लोगों तक लाभ नहीं पहुंचता है. बिचौलिए, नेता, ठेकेदार, अफसर, व्यापारी खा जाते हैं. राजीव गाँधी के समय सरकारी अनुदान के एक रूपये में से 25 पैसे गरीब नागरिक को मिलते थे, मनमोहन सिंह के राज में यह 5 पैसे रह गये.
चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि एशिया के देश तकरीबन भारत की स्वतन्त्रता के आस-पास से विकास के रास्ते निकले, भारत इन सबसे पीछे रह गया. यही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय हर तरह की रेटिंग में अनेक देशों से भारत का स्तर निम्न रहता है. परिस्थिति बदलने के लिए राजनैतिक सुधार, राजनैतिक पार्टियों पर लगाम, धन-बल दुरूपयोग पर लगाम आवश्यक है. यह विडम्बना है, कि ऐसे सब सुधारों के लिए 130 करोड़ लोगों का निर्विवाद समर्थन उपलब्ध है, फिर भी राजनैतिक और अपराधिक वर्ग इन्हें हकीकत में तब्दील नहीं होने देते हैं. 5-7 पार्टियों के 10-20 लोग अगर राष्ट्रभक्ति प्रदर्शित करते हुए राष्ट्र के नाम इन सुधारों के संकल्प की इच्छाशक्ति बना लें, तो यह काम तुरन्त हो सकता है. बस इसी बात की कमी है. देश में आज भी 99.5 प्रतिशत लोग अपराधी नहीं हैं. करोडों में योग्य सेवाभावी, राष्ट्रभक्त, योग्य लोग हैं. अन्ना हजारे, शेवन, विनोद राय जैसे अनेक योग्य सेवाभावी सज्जन चुनाव लड़ने से संकोच में रहते हैं. अगर उन्हें मौका मिले तो देश के विकास की गति चौगुणा, दस गुणा हो सकती है. लेकिन विड़म्बना है, कि गणतन्त्र में भारत के बहुसंख्यक लोगों को भी अपनी बात चलाने के लिए निराश होना पड़ता है. यह कैसा गणतन्त्र है? सेकुलरिज्म के नाम पर देश में हिंसा में विश्वास रखने वाले लोग, धर्मनिरपेक्षता का जामा पहनकर बहुसंख्यक समाज को प्रताड़ित करता है. संविधान में जाति भेद, लिंग भेद का निषेध है पर सरकार, प्रशासन, राजनैतिक पार्टियां प्रत्येक निर्णय में धर्म और जाति के समीकरण से ही फैसले लेते हैं।
राजनीतिक वर्ग, अपराधिक वर्ग धन-बल से स्थान बनाने वाले लोगों का लोकतन्त्र में कोई स्थान नहीं होना चाहिए. उपस्थित परिस्थितियों में यह स्पष्ट हो गया है, कि इन सुधारों को लाने में सरकार, राजनीतिज्ञों और राजनैतिक पार्टियों की कोई मंशा नहीं है. इसलिए नागरिक सजगता ही एक मात्रा उम्मीद बचती है. देश के प्रबुद्ध नागरिक क्या करें? क्या फर्क पडेÞगा? इत्यादि भावनाओं से ग्रसित ना होकर अपना कर्तव्य निभाने के लिए आगे आयें. राजनीतिज्ञों और सरकार पर जनता का दबाव प्रस्तुत करें. इसके लिए प्रत्येक जिले में बार एसोसिएशन, वकीलों की बार एसोसिएशन एक निगरानी समिति बनाकर स्वच्छ राजनीति के इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक अच्छी पहल हो सकती है. प्रबुद्ध नागरिकों की जागरूकता की कमी और इन विषयों पर क्रियाशीलता की अनुपस्थिति आपराधिक तत्वों का दायरा बढ़ाती है. दुर्जन लोगों को बाधित करने के लिए सज्जन लोगों का जागना जरुरी है. अच्छे लोगों के लिए रास्ता खुलें, दागी लोगों के लिए रास्ते बन्द हों.
लोकतन्त्र में मतदाता सर्वेसर्वा है. सैद्धांतिक रुप से मतदाता के पास आपराधिक तत्वों को धन बल का दुरुपयोग करने वाले लोगों को हरा देने की शक्ति है. परन्तु पार्टी तन्त्र की वजह से जब गलत प्रत्याशी बनाकर मतदाताओं को परोसा जाता है, तो मतदाता ठगा रह जाता है. राजनैतिक पार्टियों पर टिकट देने के लिए संविधान में स्पष्ट निर्देश हों, गाईडलाइन हों. उसमें निर्देशों के उल्लंघन करके टिकट देने पर चुनाव आयोग की संयुक्त मंडली को आपराधिक तत्वों के नामांकन चुनाव अधिकारी द्वारा निरस्त करने का अधिकार दिया जाना चाहिए. हारने वाले और जीतने वाले दोनों ही तरह के प्रत्याशी सीमा से अधिक खर्च करते हैं. अनेक तरह के उल्लंघन चुनाव आचार संहिता का करते हैं. अगर चुनाव आयोग चाहे तो अपने नियमानुसार आगे कदम बढ़ाकर इस तरह जीते हुए प्रत्याशियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करके सीट निरस्त कर सकता है. संचार क्रांति के माध्यम से फेसबुक, ट्वीट इत्यादि साधनों से अब तो विदेशी ताकतें भी चुनाव के हजारों किलोमीटर दूर बैठे चुनाव को प्रभावित कर रही हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति के पिछले चुनाव में ऐसा होने का संदेह था, जो अब प्रमाणित भी हो चुका है. भारत जैसे गणराज्य को इस तरह के विदेशी खतरों से भी अपने आपको सुरक्षित करना आवश्यक है अन्यथा लोकतन्त्र में और विकृतियां बढ़ेंगी. पेड न्यूज की समस्या, मीडिया ट्रायल, मीडिया के माध्यम से झूठ को सच बनाने, मिथ्या प्रचार द्वारा भ्रांतियां फैलाई जा सकती हैं. इसके लिए भी कारगर उपाय करने होंगे.
देश के प्रबुद्ध नागरिकों उठो, जागो और अपने भविष्य के लिए, अगली पीढ़ियों के भविष्य के लिए अपनी जिम्मेदारी संभालो. राजतन्त्र पर दबाव बनायें और लोकतन्त्र को बचायें. लोकतन्त्र को आगे बढ़ायेंगे तो विकास को गति मिलेगी. लोकतन्त्र अपराधमुक्त हो. गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई, अन्याय, जातिवाद, आतंकवाद, धार्मिक अतिवाद एवं उन्माद के लिए भारत के लोकतन्त्र में कोई जगह न हो. शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाएं अच्छी सुलभ हों. लोकतन्त्र की कमान सेवाभावी, नि:स्वार्थी, जनप्रतिनिधियों के हाथ में ही हो. कोई भी जनप्रतिनिधि दागी न हो.
जय हिन्द
( डॉ. रिखब चन्द जैन, लेखक भारतीय मतदाता संगठन के अध्यक्ष और टी.टी. ग्रुप के चेयरमैन हैं)

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