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केंद्र से सीधे निगम को फंड मिलना संभव नहीं, दिल्ली सरकार ही हल कर सकती है समस्या- महापौर

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राजधानी दिल्ली में साफ-सफाई की व्यवस्था दुरूस्त होने का नाम नहीं ले रही है. नई-नवेली आम आदमी पार्टी के आने के बाद भी दिल्लीवासियों के लिए राजधानी को साफ-सुथरा देखना दिवास्वप्न ही बनकर रह गया है. राजधानी के तमाम तरह के मुख्य आकर्षण का केंद्र होने के बावजूद भी दिल्ली में कूड़े के ढेर खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं. इस कूड़े के कहर का असर करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य और खुद दिल्ली की चमकीली छवि पर भी पड़ता है, लेकिन अफसोस की सरकारें इस स्थिति को बदलने में पूरी तरह नाकाम रही हैं. बीते 15 वर्षों से नगर निगम में शासन कर रही भाजपा चुनाव के वक्त हर बार राजधानी को स्वच्छता की नई मिसाल बनाने का दावा पेश करती रही है, लेकिन दिल्ली में सफाई के हालात नहीं बदलते. अब एक बार फिर निगम की टीम बदलने के बाद यह सवाल है, कि क्या नई टीम अपने कामकाज के जरिए निगम की नई छवि पेश कर पायेगी या फिर निगम की वही पुरानी कार्यशैली जारी रहेगी. हमने इन्हीं तमाम मुद्दों पर दक्षिण दिल्ली नगर निगम के महापौर नरेंद्र चावला से बात की.

प्रश्न- निगम का एक साल से भी ज्यादा कार्यकाल बीतने के बावजूद राजधानी की सफाई व्यवस्था दुरूस्त नहीं हो पाई है. अब आप महापौर के पद पर पहुंचे हैं तो क्या, कुछ नया दिखेगा या स्थिति जस की तस रहेगी?
उत्तर- स्वच्छता का मुद्दा रोजाना चलने वाली गतिविधि है. जिसमें हर रोज कूड़ा निकलता है और साफ होता है. हालांकि लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए गंदगी फैलाने से बचना होगा, क्योंकि क्योंकि निगम अपनी तरफ से हरसंभव प्रयास कर रहा है, उसमें जनता का सहयोग वांछित है. महापौर पद पर नियुक्त होने के बाद हमने कई योजनाओं पर काम करने की तैयारी की है, जिनमें स्वच्छता, शिक्षा, पार्किंग की व्यवस्था और स्वास्थ्य संबंधित योजनाएं शामिल हैं.
प्रश्न- तमाम कोशिशों के बावजूद निगम के स्कूलों की खस्ता हालत सुधर नहीं पा रही है.
उत्तर- ऐसा नहीं है, निगम के स्कूल बेहतर हालात में हैं. यदि दिल्ली सरकार के स्कूलों से निगम स्कूलों की तुलना की जाए तो आप देखेंगे कि दिल्ली सरकार के स्कूलों के मुकाबले निगम के स्कूल बेहतर शिक्षा देने का माद्दा रखते हैं. अब हम इन स्कूलों में स्मार्ट क्लास रूम की व्यवस्था की तैयारी कर रहे हैं.
प्रश्न- निगम में हर साल फंड की कमी का मुद्दा उठता है? जिसका प्रभाव सफाई कर्मचारियों और जनता पर पड़ता है, लेकिन कभी कोई निश्चित समाधान नहीं निकल पाता, इसकी क्या वजह है?
उत्तर- निगम में फंड की कमी का मुख्य कारण दिल्ली सरकार द्वारा रोका गया फंड है. जब तक नियमानुसार हमें दिल्ली सरकार फंड आवंटित नहीं करेगी, तब तक निगम का कामकाज प्रभावित होता रहेगा. दिल्ली सरकार ने निगम के लगभग साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए की राशि रोकी हुई है, जिसके चलते निगम और जनता दोनों ही परेशान हैं.
प्रश्न- निगम चुनाव के वक्त भाजपा ने अपने मेनिफेस्टो में कहा था, कि यदि दिल्ली सरकार निगम का फंड नहीं देगी, तो वह केंद्र सरकार से फंड प्राप्त करने की व्यवस्था तैयार करेगी. उस तरफ कोई काम क्यूं नहीं होता?
उत्तर- हम गृहमंत्री राजनाथ सिंह के पास इस प्रस्ताव को लेकर गए थे, लेकिन कुछ तकनीकी अड़चनों के चलते यह संभव नहीं है.  यह भी पढ़ें : अपनी नाकामियां छुपाने की कोशिश कर रही है केंद्र और दिल्ली की सरकार- जे.पी. पंवार हमने गृहमंत्री जी से अनुरोध किया था, कि वे हमें सीधे फंड दें, लेकिन उन्होंने हमें बताया कि तकनीकी तौर पर ऐसा संभव नहीं है. ऐसे में दिल्ली सरकार ही इस फंड की कमी के मुद्दे को सुलझा सकती है.
प्रश्न- मानसून का सीजन सिर पर है, जिसके बाद डेंगू और चिकनगुनिया का कहर भी बीते कुछ सालों में देखने को मिलता है. निगम की इन सबसे निपटने की क्या तैयारियां हैं?
उत्तर- हमने 15 जून तक सभी नालों को साफ करने का लक्ष्य रखा है, जिससे डेंगू, चिकनगुनिया जैसी गंभीर बीमारियों से लोगों को बचाया जा सके. हालांकि इसमें पीडब्ल्यूडी के अंतर्गत आने वाले नालों की सफाई भी एक अहम मुद्दा रहती है, जिसकी जिम्मेदारी दिल्ली सरकार सही से नहीं निभा रही है. यदि दिल्ली सरकार निगम को पूरा सहयोग दे तो राजधानी को डेंगू के कहर से बचाया जा सकता है.
प्रश्न- सीलिंग के मुद्दे को लेकर भी निगम निशाने पर है. उस पर व्यापारियों को राहत नहीं दिला पाने के आरोप हैं.
उत्तर- सीलिंग पर निगम ने व्यापारियों से किया वादा निभाने की पूरा प्रयास किया है. निगम की कोशिशों के चलते ही उपराज्यपाल ने 351 सड़कों पर सीलिंग नहीं करने का आदेश दिया और इन सड़कों पर व्यापारियों को काफी राहत भी मिली. इस पूरे मुद्दे पर दिल्ली सरकार की नाकामी ने चीजें बिगाड़ी हैं, जिसने समय से अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की.

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