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जाटव नहीं हैं चमार, यादव और राजपूत जातियों से कन्वर्टेड है जाटव समाज, 1935 में प्रकाशित अनुसूचित जातियों की सूची में जाटव जाति का कोई उल्लेख नहीं- शांत प्रकाश जाटव

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श्री यादव जाटव राजपूत कष्ट निवारक सभा लोटी सफियाबाद द्वारा जारी किया गया पत्र
संदीप त्यागी
नई दिल्ली. 16 अक्तूबर. मौजूदा समय में देश के अलग-अलग हिस्सों से उठ रहे जातिगत वैमनस्यता और अंतर्विरोधों के मामलों पर खेद जताते हुए भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता शांत प्रकाश जाटव ने कहा है, कि अंग्रेजों के समय से देश में अछूत जातियों में शामिल होने का जो षड्यंत्र शुरू हुआ था, उसके वीभत्स परिणाम आज पूरा देश देख रहा है. जाटव ने
Shant Prakash Jatav, Bjp Leader
कहा कि उनका अपना स्वयं का जाटव समाज, जो आज खुद को चमार जाति से जोड़ने पर आमादा है, उसकी हकीकत यह है, कि ये समाज यादव और राजपूत जातियों से कन्वर्ट होकर बना है. उन्होंने कहा कि जाटव समाज का चमार जाति से सीधा कोई संबंध नहीं है. भाजपा नेता ने कहा कि जाटव समाज की आबादी सिर्फ कानपुर, ब्रज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से में ही है और इनमें से अधिकांशत: खेती-किसानी के काम से जुड़े हुए हैं. उन्होंने कहा कि चमड़े के काम से जाटव समाज का कभी कोई सीधा संबंध नहीं रहा है. उन्होंने कहा कि आज जाटव समाज का एक हिस्सा खुद को चमार जाति से जोड़ रहा है, जबकि सच यह है, कि 1935 में प्रकाशित संयुक्त प्रांत (यूनाइटेड प्रोविंस) और अन्य प्रांतों की अनुसूचित जाति की सूची में जाटव जाति का कोई उल्लेख नहीं है. भाजपा नेता ने इस तथ्य के पक्ष में 1932 के श्री यादव जाटव राजपूत कष्ट निवारक सभा लोटी सफियाबाद की ओर से जारी एक सर्टिफिकेट रखते हैं, जिसमें एक शख्स सुंदर सिंह पुत्र चंदन सिंह को जाटव जाति का नागरिक घोषित किया गया है. श्री यादव जाटव राजपूत कष्ट निवारक सभा लोटी सफियाबाद द्वारा जारी इस प्रमाण पत्र में कहा गया है, कि सभा इस जाटव शब्द को यूपी काउंसिल में 14 जुलाई सन् 1932 को पास करा चुकी है. 14 जुलाई को सेकेरेट्री बोर्ड लखनऊ द्वारा जारी इस पत्र में कहा गया है, कि काउंसिल के प्रश्न संख्या 65-66-67 के उत्तर सहित जवाब भेजे
श्री यादव जाटव राजपूत कष्ट निवारक सभा लोटी सफियाबाद द्वारा जारी किया गया पत्र
जाते हैं, कि यूपी प्रांत के तमाम जिलों के कलेक्टर्स को जाटव नाम लिखने की सूचना दी है, कि इनको जाटव नाम से लिखें और ग्राम पंचायतों को भी सर्वसाधारण तरीके से घोषित किया जाता है, कि जाटव जाति को किसी अन्य नाम से बुलाया जायेगा तो उसे मानहानि का दंड दिया जायेगा. यही नहीं श्री यादव जाटव राजपूत कष्ट निवारक सभा लोटी सफियाबाद द्वारा जारी इस प्रमाण पत्र में कहा गया है, कि उक्त शख्स को हमने भी प्रमाणित करके अपनी श्री जाटव सभा की तरफ से सर्टिफिकेट दे दिया है और आज से यह शख्स और इसके परिवार के सदस्य भी श्री जाटव प्रथा के सदृश्य खान-पान में सम्मिलत हो चुके हैं. शांत प्रकाश जाटव कहते हैं, कि आज भी ऐसे सर्टिफिकेट स्थानीय तहसीलों में बड़ी तादाद में देखे जा सकते हैं. भाजपा नेता ने कहा कि सच यह है, कि 1950 में जब भारतीय संविधान बना, तब उसमें जाटव जाति पहली बार अनुसूचित जाति में शामिल हुई. शांत प्रकाश जाटव ने कहा कि 1935 के बाद से ही अलग-अलग तरह से कई समाजों में अनुसूचित जातियों की सूची में खुद को दर्ज कराने की होड़ लग गई थी. ऐसे में 1935 के बाद से ही यादव और राजपूत जातियों से एक बड़ा वर्ग कन्वर्ट होकर जाटव जाति में तब्दील हो गया. जाटव ने कहा कि आज भी अगर ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर कानपुर, ब्रज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में बसे जाटव समाज का विश्लेषण करें तो ध्यान में आता है, कि जिन जगहों पर जाटव समाज बड़ी संख्या में मौजूद है, वहां पर आज राजपूत और यादव समाज लगभग नहीं के बराबर है. जाटव कहते हैं, कि इसका कारण यही है, कि यहां रहने वाली यादव और राजपूत जातियां अधिकांशत: जाटव समाज में कन्वर्टेड हो गर्इं. यह भी पढ़ें : वैश्य अग्रवाल समाज का देश के विकास में अहम योगदान- अरविंद केजरीवाल शांत प्रकाश ने खुद को अनुसूचित जातियों में शामिल होने की होड़ में जुटी इस प्रक्रिया को दुखद बताते हुए कहा कि आज समाज के बुद्धिजीवी वर्ग और युवाओं को यह सोचने की जरूरत है, कि ब्रिटिश रूल्ड इंडिया में 1935 में 429 जातियां अनुसूचित जातियों के तौर पर दर्ज की गई थीं. 1950 में यह आंकड़ा 593 जातियों तक पहुंच गया और आज वर्ष 2018 में अनुसूचित जाति सूची में 1235 जातियां शामिल की जा चुकी हैं. ऐसे में हमें विचार करने की जरूरत है, कि हम देश से अस्पृश्यता का दंश हटा रहे हैं या बढ़ा रहे हैं. जाटव ने मौजूदा परिदृश्य में देश भर में जगह-जगह उठ रही जातिगत आधार पर आरक्षण की मांग और समाज के बीच हो रहे विभाजन को दुखद बताते हुए कहा, कि अगर अभी भी देश का युवा वर्ग अपने सही इतिहास को जानने और मानने के लिए तैयार नहीं हुआ, तो आने वाला समय में यह और भी विभेदकारी साबित होगा. उन्होंने कहा कि समाज को जातियों में बांटने के इस षडयंत्र को युवाओं को समझना होगा और यह तभी संभव होगा, जब उन्हें उनका सच्चा इतिहास बताया जाये न कि अपनी राजनीति चमकाने के लिए समाज को बांटने का षडयंत्र किया जाये.

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