Home Arts & Culture माँ जन्मदात्री ही नहीं, जीवन निर्मात्री भी…

माँ जन्मदात्री ही नहीं, जीवन निर्मात्री भी…

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सांकेतिक चित्र
                       अन्तर्राष्ट्रीय मातृत्व दिवस पर विशेष

अन्तर्राष्ट्रीय मातृत्व दिवस सम्पूर्ण मातृ-शक्ति को समर्पित एक महत्वपूर्ण दिवस है, जिसे मदर्स डे, मातृ दिवस या माताओं का दिन चाहे जिस नाम से पुकारें, यह दिन सबके मन में विशेष स्थान लिये हुए है. पूरी जिंदगी भी समर्पित कर दी जाए तो माँ के ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता है. संतान के लालन-पालन के लिए हर दुख का सामना बिना किसी शिकायत के करने वाली माँ के साथ बिताये दिन सभी के मन में आजीवन सुखद व मधुर स्मृति के रूप में सुरक्षित रहते हैं. भारतीय संस्कृति में माँ के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा रही है, लेकिन आज आधुनिक दौर में जिस तरह से मदर्स डे मनाया जा रहा है, उसका इतिहास भारत में बहुत पुराना नहीं है. इसके बावजूद दो-तीन दशक से भी कम समय में भारत में मदर्स डे काफी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है.
Writer Lalit Garg, File Photo
हर संतान अपनी माँ से ही संस्कार पाती है. लेकिन मेरी दृष्टि में संस्कार के साथ-साथ शक्ति भी माँ ही देती है. इसलिए हमारे देश में माँ को शक्ति का रूप माना गया है और वेदों में मां को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है. श्रीमद् भगवद् पुराण में उल्लेख मिलता है, कि माता की सेवा से मिला आशीष सात जन्मों के कष्टों व पापों को दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है.
प्रख्यात वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने माँ की महिमा को उजागर करते हुए कहा है, कि जब मैं पैदा हुआ, इस दुनिया में आया, वो एकमात्र ऐसा दिन था मेरे जीवन का जब मैं रो रहा था और मेरी माँ के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान थी. एक माँ हमारी भावनाओं के साथ कितनी खूबी से जुड़ी होती है, ये समझाने के लिए उपरोक्त पंक्तियां अपने आप में सम्पूर्ण हैं. 
अब्राहम लिंकन का माँ के बारे में मार्मिक कथन है, कि जो भी मैं हूँ, या होने की उम्मीद है, मैं उसके लिए अपने प्यारी माँ का कर्जदार हूँ. किसी औलाद के लिए माँ शब्द का मतलब सिर्फ पुकारने या फिर संबोधित करने से ही नहीं होता बल्कि उसके लिए माँ शब्द में ही सारी दुनिया बसती है, दूसरी ओर संतान की खुशी और उसका सुख ही माँ के लिए उसका संसार होता है. क्या कभी आपने सोचा है, कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में माँ ही क्यों याद आती है, क्योंकि वो माँ ही होती है जो हमें तब से जानती है जब हम अजन्में होते हैं. जितना माँ ने हमारे लिए किया है उतना कोई दूसरा कर ही नहीं सकता. जाहिर है माँ के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि एक सदी, कई सदियां भी कम हैं. यह भी पढ़ें : ब्राह्मण चेतना मंच ने धूमधाम से मनाया भगवान परशुराम का जन्मोत्सव  माँ को उसकी देवी सम्मान दिलाना वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता में से एक है. माँ ने ही अपने हाथों से इस दुनिया का ताना-बाना बुना है. सभ्यता के विकास क्रम में आदिमकाल से लेकर आधुनिककाल तक इंसानों के आकार-प्रकार में, रहन-सहन में, सोच-विचार, मस्तिष्क में लगातार बदलाव हुए, लेकिन मातृत्व के भाव में बदलाव नहीं आया. उस आदिमयुग में भी माँ, माँ ही थी. तब भी वह अपने बच्चों को जन्म देकर उनका पालन-पोषण करती थी. उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा करना सिखाती थी. आज के इस आधुनिक युग में भी माँ वैसी ही है. माँ नहीं बदली. माँ विधाता की रची इस दुनिया को फिर से, अपने ढंग से रचने वाली विधाता है. माँ सपने बुनती है और यह दुनिया उसी के सपनों को जीती है और भोगती है. माँ ही अपनी संतानों के भविष्य का निर्माण करती है. इसलिए माँ को प्रथम गुरु कहा गया है. स्टीव वंडर ने सही कहा है, कि मेरी माँ मेरी सबसे बड़ी अध्यापक थी, करुणा, प्रेम, निर्भयता की एक शिक्षक. अगर प्यार एक फूल के जितना मीठा है, तो मेरी माँ प्यार का मीठा फूल है.
प्रथम गुरु के रूप में अपनी संतानों के भविष्य निर्माण में माँ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. माँ कभी लोरियों में, कभी झिड़कियों में, कभी प्यार से तो कभी दुलार से बालमन में भावी जीवन के बीज बोती है. इसलिए यह आवश्यक है, कि मातृत्व के भाव पर नारी मन के किसी दूसरे भाव का असर न आए, जैसाकि आज कन्या भ्रूणों की हत्या का जो सिलसिला बढ़ रहा है, वह नारी-शोषण का आधुनिक वैज्ञानिक रूप है तथा उसके लिए मातृत्व ही जिम्मेदार है. महान जैन आचार्य एवं अणुव्रत आन्दोलन के प्रवर्तक आचार्य तुलसी की मातृ शक्ति को भारतीय संस्कृति से परिचित कराती हुई निम्न प्रेरणादायिनी पंक्तियां पठनीय ही नहीं, मननीय भी हैं कि भारतीय माँ की ममता का एक रूप तो वह था, जब वह अपने विकलांग, विक्षिप्त और बीमार बच्चे का आखिरी सांस तक पालन करती थी. परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा की गई उसकी उपेक्षा से माँ पूरी तरह से आहत हो जाती थी. वही भारतीय माँ अपने अजन्मे, अबोल शिशु को अपनी सहमति से समाप्त करा देती है. क्यों? इसलिए नहीं कि वह विकलांग है, विक्षिप्त है, बीमार है पर इसलिए कि वह एक लड़की है. क्या उसकी ममता का स्रोत सूख गया है? कन्या भू्रणों की बढ़ती हुई हत्या एक ओर मनुष्य को नृशंस करार दे रही है, तो दूसरी ओर स्त्रियों की संख्या में भारी कमी मानविकी पर्यावरण में भारी असंतुलन उत्पन्न कर रही है. अन्तर्राष्ट्रीय मातृ-दिवस को मनाते हुए मातृ-महिमा पर छा रहे ऐसे अनेक धुंधलों को मिटाना जरूरी है, तभी इस दिवस की सार्थकता है.

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