Home National News योजनाएं बनीं, लेकिन जमीन पर नहीं दिखा ज्यादा बदलाव- डॉ. रिखबचंद जैन

योजनाएं बनीं, लेकिन जमीन पर नहीं दिखा ज्यादा बदलाव- डॉ. रिखबचंद जैन

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Dr. Rikhab Chand jain, File Photo
चुनाव सुधार और गौरक्षा जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर सफल मुहिम चलाने वाले व्यवसायी टी.टी ग्रुप के चेयरमैन डॉ. रिखबचंद जैन समसामयिक मुद्दों पर बेलौस अंदाज में अपने विचार रखते रहे हैं. बड़े बदलाव का वादा करके सत्ता में आई केंद्र सरकार के कार्यकाल के चार साल बीत चुके हैं. ऐसे में कई मुद्दों पर सरकार का पुरजोर समर्थन करने वाले डॉ. रिखबचंद जैन बीते चार साल में क्या बदलाव देखते हैं? नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े कदम भी सरकार ने इस दौरान उठाये हैं. व्यापारिक माहौल सहित तमाम मुद्दों पर डॉ. जैन से पत्रकार संदीप त्यागी ने बात की.

प्रश्न- आपने भारतीय मतदाता संगठन के कार्यभार से विश्राम लिया है. क्या नेतृत्व परिवर्तन से कुछ बदलाव देखने को मिलेगा?
उत्तर- अपनी व्यस्तताओं और बढ़ती उम्र को देखते हुए मैंने इस पदभार को छोड़ने का फैसला किया. अब युवा हाथों में संगठन की कमान है. अगर युवाओं के हाथ में कमान आती है तो उत्साह बढ़ता है और मूवमेंट तेजी से आगे बढ़ता है. परिवर्तन दुनिया का नियम है. हम भी उसी का पालन कर रहे हैं. इससे निश्चित तौर पर नई ऊर्जा और बदलाव देखने को मिलेंगे. मैं उम्मीद करता हूँ कि यह सब बदलाव सकारात्मक होंगे.
प्रश्न- पिछले लंबे समय से चलाई जा रही इस मुहिम के जमीनी प्रभाव कुछ खास नहीं रहे हैं. इसका भविष्य किस तरह से देखते हैं?
उत्तर- यह एक हद तक दुर्भाग्यपूर्ण सच है, कि इस मुहिम के जमीनी प्रभाव अभी बहुत ज्यादा नहीं दिखते हैं. लेकिन ऐसी मुहिम का फायदा यह होता है, कि समाज के बौद्धिक वर्ग में किसी विषय के बारे में चर्चा शुरू होती है और उसकी सोच में परिवर्तन आता है. बौद्विक वर्ग की सोच से निकला यह परिवर्तन समाज में निचले स्तर तक पहुंचता है, जिसके बाद चीजें बदलती हैं. जहां तक इसके बहुत ज्यादा सफल नहीं होने का कारण है, तो उसके लिए बड़ी हद तक राजनैतिक दलों का गैरजिम्मेदार रवैय्या है. बात सभी भले ही लोकतंत्र की करें, लेकिन चाहता हर कोई मनमर्जी ही करना है.
प्रश्न- नई सरकार भी इस रवैय्ये को नहीं बदल पाई है?
उत्तर- बिल्कुल भी नहीं, कुल मिलाकर चुनाव सुधारों पर कोई भी काम करने का इच्छुक नहीं दिखता है. मौजूदा सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जरूर देश भर में चुनाव एक ही वक्त में करवाने की बात करते रहे हैं, लेकिन चुनाव सुधारों को लेकर कोई बड़ा बदलाव इस सरकार में भी नहीं दिखा है.
प्रश्न- व्यवस्था में बड़े परिवर्तन के लिए देश ने 2014 में वोट किया था. क्या चार साल के बाद आप वह बड़ा बदलाव देखते हैं?
उत्तर- जैसा जमीनी स्तर पर बहुत बड़ा परिवर्तन देखना चाहते थे, वह तो नहीं हुआ है. हालांकि यह कह देना कि बिल्कुल काम नहीं हुआ है वह भी गलत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की मजबूत इच्छाशक्ति के चलते नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदम जरूर उठाये गए. वहीं कोर्ट के आदेशों से भी कुछ चीजें बदली हैं. लेकिन मैं फिर यही कहता हूँ कि हम जो अभियान चला रहे हैं, उससे भी यही निकला कि अगर मतदाता बदले तो बड़े बदलाव व्यापक तौर पर देखने को मिल सकते हैं.
प्रश्न- नोटबंदी और जीएसटी पर भी कई सवाल उठते रहे हैं. जीएसटी के चलते अनआॅर्गेनाइज्ड सेक्टर पर बुरे असर की बात भी कही जाती है. आप इसे किस नजरिये से देखते हैं?
उत्तर- नोटबंदी और जीएसटी दोनों ही बड़े निर्णय थे. यह दोनों ही साहसिक कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने उठाए. हालांकि नोटबंदी का असर बैंकिंग स्टाफ की खामियों के चलते बिगड़ गया. जीएसटी का थोड़ा लाभ देश को जरूर हुआ है, लेकिन जितना हो सकता था वह हिस्से में नहीं आया. जहां टैक्स के कई स्लैब के चलते व्यापारी परेशान हैं, वहीं एक्सपोर्टर को रिटर्न नहीं मिल रहा. आॅर्गेनाइज सेक्टर को थोड़ा लाभ जरूर हुआ है, लेकिन छोटे व्यवसाय और अनआॅर्गेनाइज सेक्टर से जुड़े लोग आज दुखी हैं, उन पर निश्चित तौर पर इसका बुरा असर पड़ा है. हमने कई सारे सुधार इस जीएसटी प्रक्रिया में सजेस्ट किए थे, जिन पर पूरे तरीके से काम नहीं हुआ.
प्रश्न- व्यापारिक माहौल को लेकर सरकार के कामकाज को किस नजर से देखते हैं? कितना बिजनेस फ्रैंडली माहौल बन पाया है?
उत्तर- मैंने पहले ही कहा कि कई सारी योजनाएं हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने शुरू कीं. फिर चाहे वह ‘इज आॅफ डूइंग बिजनेस’हो, ‘स्टार्टअप इंडिया’ हो या ‘स्किल इंडिया’. लेकिन व्यवस्था में आमूलचूल सुधार ना होने के चलते जमीन पर वह उस तरह नहीं उतरीं, जैसा उन्हें होना चाहिए था. मैं फिर कह रहा हूँ कि काम हुआ है, लेकिन जनता तक इसका एहसास अभी नहीं पहुंचा है.
प्रश्न- आप गौरक्षा के मुद्दे को भी उठाते रहे, मौजूदा माहौल में लिंचिंग की कई घटनाएं गौरक्षा के नाम पर हुई हैं, इसे कैसे देखते हैं? साथ ही मौजूदा सरकार की चुनाव के बाद वापसी को लेकर क्या सोचते हैं?
उत्तर- अगली सरकार को लेकर मुझे नहीं लगता कि कोई बड़ा बदलाव होने वाला है. अगला चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम कौन के बीच होने जा रहा है. मौजूदा उपचुनाव के नतीजों से बहुत ज्यादा कयास नहीं लगाए जाने चाहिएं. मौजूदा वक्त में विपक्ष सशंकित है. गठबंधन का भी कोई उचित माहौल नहीं दिखता. भारतीय जनता पार्टी की सीटें जरूर कुछ घट सकती हैं, लेकिन सरकार बनाने में कामयाब रहेगी. जहां तक बात गौरक्षा की है, तो गौरक्षा एक अहम मुद्दा था, यह भी पढ़ें : 2019 के चुनाव को अपराधमुक्त सुनिश्चित करें राजनैतिक दल- अश्विनी उपाध्याय  लेकिन सरकार उस पर अच्छा काम नहीं कर पाई. जहां तक लिंचिंग की घटनाओं की बात है, उसे सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता है. लेकिन कड़वा सच यह है, कि इस मौजूदा सरकार के वक्त में गौरक्षा को लेकर कोई नया कानून बनाना तो दूर जो मौजूदा कानून थे, उनका भी तरीके से इस्तेमाल नहीं हो पाया. इस सरकार के आने के बाद हालात इस कदर बद्तर हुए कि होटलों कि मेन्यू में ‘बीफ’ लिखा जाने लगा, मांस की दुकानों पर गाय की फोटो तक लग गर्इं. और लोगों में गौमांस के सेवन पर जो ग्लानि भाव होता था, वह दूर हो गया है. कुछ लोग आज खुलकर कह रहे हैं, कि हम गाय का मांस खा रहे हैं और जगह-जगह बीफ फेस्टिवल की घटनाएं भी सुनने को मिल जाती हैं. उत्तर पूर्वी राज्यों में बीजेपी की सरकारें भी यही सब कर रही हैं और सरकार की हिम्मत नहीं है, कि वह इस पर कोई ठोस कार्यवाही कर सके.

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