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मासूम की मौत का जिम्मेदार प्राइवेट अस्पताल, लेकिन अनियंत्रित निजी प्राइवेट संस्थानों का जिम्मेदार कौन..?

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सांकेतिक चित्र
डॉ. अंकित ओम, सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर आचार्य भिक्षु हॉस्पीटल
फोर्टिस और मैक्स जैसे बड़े प्राइवेट हॉस्पीटल में हुर्इं हाल की घटनाओं ने समाज को स्तब्ध कर दिया है. और दूसरी ओर इन दुखद घटनाओं पर लीपापोती की राजनीति भी शुरू हुई है. वही राजनीति जो बीआरडी मेडिकल कॉलेज के हादसे में हुए मासूमों की मौत पर चुप्पी साध लेती है और मैक्स में हुई घटना पर आसमान सर पर उठा लेती है. वही राजनीति जो मैक्स और फोर्टिस की दुखद घटना पर भी अलग-अलग प्रतिक्रिया देती है.
जी हां! आज जैसी जनचेतना आहत हुई है, वैसी पहले कभी नहीं हुई थी. लेकिन मैं इस मामले को सिर्फ राजनीति एंगल से ही न देखकर आपको कुछ फैक्ट्स से अवगत कराना चाहता हूँ. आज समाज को पता चलना चाहिए कि सरकारें जनता से क्या छुपा रही हैं? बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012 से 2017) में लगातार 5 वर्षों से सरकारों को चेताया जा रहा है, कि स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकार को जीडीपी का मौजूदा खर्च 1.15 प्रतिशत से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत कर देना चाहिए तभी इन सभी समस्याओं को हल किया जा सकता है. आपको जानकर हैरत होगी कि मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था में सिर्फ 4 प्रतिशत पब्लिक भागीदारी है, अर्थात 4 प्रतिशत लोग 96 प्रतिशत लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल कर रहे हैं. जबकि चीन में यह आंकडा 40 प्रतिशत, यूएस और कनाडा में 70.50 प्रतिशत तथा जर्मनी और फ्रांस में 70 प्रतिशत है. 
फिर आखिर क्या वजह है, कि सरकारें स्वास्थ्य को मूल अधिकार बनाने से पीछे हटती हैं और स्वास्थ्य के नाम पर नए प्राइवेट संस्थानों को लाइसेंस बांटकर माफिया बनाने में मशगूल दिखती हैं. अब जब ये प्राइवेट संस्थान अनियंत्रित हो गए हैं. और ऐसे हादसे मीडिया का ध्यान खींचते हैं, तो फिर सरकारें उसमें लीपापोती करने लगती हैं. जैसे डॉक्टर या अस्पताल पर एक्शन लेना. जबकि जरूरत यह है, कि जिम्मेदारी सबकी तय की जानी चाहिए. तमाम सरकारें लगातार अपनी लापरवाही की वजह से स्वास्थ्य विभाग को बेहद बुरे दौर में खींच लाई हैं. इसके बावजूद भी देश के डॉक्टर इसे चुनौती मानते हुए अपने दम पर इस कमजोर व्यवस्था में अपना शत-प्रतिशत देकर भी हत्यारे कहला रहे हैं. शर्म आती है ऐसे समाज की सेवा करते, जो यह भी नहीं समझ सकता कि उसके साथ हो रही नाइंसाफी की वजह क्या है? जहां इंडियन डॉक्टर्स यूएस, यूके, फ्रांस, जर्मनी में एक बेहतर व्यवस्था में कार्य करते हुए देश का नाम रोशन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत में झोलाछाप नेता अपनी गलत नीतियों और सस्ती वोट बैंक की राजनीति के लिए डॉक्टर्स के प्रति जनता में आक्रोश भरते दिख रहे हैं. यह भी पढ़ें : बच्चों, बूढ़ों और बीमारों के लिए जानलेवा हो सकता है स्मॉग, अब देखने का नहीं चेतने का वक्त 
अगर बीते वर्षों के कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है, कि स्वास्थ्य व्यवस्था में तमाम खामियों के बावजूद डॉक्टर्स ने कितना कमाल का प्रदर्शन किया है. मृत्यु के आंकड़े यानि की डेथ रेट जो 1991 में 7.1 था, वो 2015 में 5.4 हो गया है. आईएमआर जो 1994 में 74 था, वह 2015 में 37 है, जबकि देश की राजधानी दिल्ली में यह 18 है. ये आंकड़े उन तमाम डॉक्टर्स की कुशलता और जीत की कहानी बताते हैं, जिन्होंने नेताओं और प्राइवेट संस्थानों की सांठ-गांठ से पनपे इस मुश्किल माफिया तंत्र में भी निरंतर अपना धर्म निभाया है, मरीजों की सेवा की है.
आज देश के आम जनमानस को इस मेडिकल व्यवस्था के बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है. देश में 462 मेडिकल कॉलेज हैं, जो सालाना 56,748 डॉक्टर तैयार करते हैं. जबकि देश की जनसंख्या हर वर्ष 2.6 मिलियन बढ़ जाती है. जहां एक तरफ 70 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं निजी संस्थान देखते हैं, वही सरकारी सुविधाओं का प्रतिशत मात्र 30 है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार 1000 की जनसंख्या पर एक डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन भारत में ये अनुपात 10,189 पर एक डॉक्टर है. हमें सोचना होगा कि आखिरकार सुविधाओं और मांग के बीच बढ़ती इस खाई पर ये राजनैतिक दल और सरकारें क्यूँ कुछ नहीं बोलती हैं? क्यूँ नहीं उस पर आवाज उठाने के लिए कोई तैयार होता?
स्वास्थ्य हम सबका अधिकार है और यह तभी हासिल होगा, जब इस पर सभी वर्ग बैठकर तर्क आधारित एक स्वस्थ विचार-विमर्श करें, ना कि मासूमों की मौत पर राजनीति के बहाने एक-दूसरे पर वार करने का मौका ढूंढें. सरकार को अब खुद की जवाबदेही भी बतानी पड़ेगी कि सरकारें कब स्वास्थ्य को अधिकार बनाकर प्राथमिकता समझते हुए जीडीपी का 1.15 प्रतिशत से बढ़कर 2.5 प्रतिशत करेंगी?
मुझे लगता है, कि इन पांच मूलभूत सिद्धांतों पर कार्य करने की जरूरत है. पहला यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज यू.एस.जी के तहत सभी के जीवन का सरकारी बीमा होना आवश्यक बनाया जाये. दूसरा स्वास्थ्य को मूल अधिकार का दर्जा दिया जाये. तीसरे फैमिली मेडीसिन ब्रांच को आगे बढ़ाया जाए ताकि ज्यादातर मरीजों को अनावश्यक खर्चा ना करना पड़े. चौथा कदम जीडीपी को तत्काल 1.15 प्रतिशत से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत किया जाये तथा पांचवा इंडियन मेडिकल सर्विस का गठन किया जाये, ताकि देश में प्राथमिकता के आधार पर डॉक्टरों को भेजा जा सके. जैसे इंडियन आर्मी, इंडियन सिविल सर्विस में पहले ऐसा होता रहा है. इस पांच सूत्रीय फॉर्मूले पर अमल कर हम स्वास्थ्य सेवाओं में आमूलचूल सुधार ला सकेंगे, नहीं तो कभी कोई फोर्टिस और कभी कोई मैक्स, यह सिलसिला ऐसे नहीं रूकेगा.
(डॉ. अंकित ओम, लेखक आचार्य भिक्षु हॉस्पीटल में सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर हैं)

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