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केंद्र सरकार की नीतियों से जनता त्रस्त, कांग्रेस करेगी जोरदार वापसी- देवेन्द्र यादव

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लगातार डेढ़ दशक तक राजधानी की सत्ता संभालनी वाली कांग्रेस बीते चार सालों से राजधानी के सत्ता के गलियारों में अप्रासंगिक हो गई है. रही-सही कसर देश भर में कांग्रेस के लचर प्रदर्शन ने पूरी कर दी. अब लगभग चार साल बाद गुजरात के विधानसभा चुनाव को पूरे दम-खम से लड़ने वाली और राजस्थान उपचुनाव में 3-0 से स्वीप करने वाली कांग्रेस एक बार फिर जोशो-खरोश से लड़ती दिखाई दे रही है. राजधानी में भी दिल्ली कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अजय माकन और पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपने पुराने मतभेद भुलाकर एक साथ सामने हैं. साथ ही नौ महीने पर निगम चुनाव के वक्त कांग्रेस को छोड़कर जाने वाले वरिष्ठ नेता अरविंदर सिंह लवली भी पार्टी में वापस लौट आये हैं. राजस्थान में संसदीय सीट पर चुनाव का कामकाज देखने वाले राजधानी के युवा तेज-तर्रार पूर्व विधायक देवेन्द्र यादव मानते हैं, कि गुजरात की कड़ी टक्कर, राजस्थान के क्लीन स्वीप ने कांग्रेस में नई जान फूंक दी है. देश के कई उपचुनाव में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन तथा राजधानी में संगठन को मजबूती देने में जुटी कांग्रेस की वापसी समेत कई मुद्दों पर पत्रकार संदीप त्यागी के साथ देवेन्द्र यादव का साक्षात्कार.

प्रश्न- क्या राजधानी में कांग्रेस अप्रासंगिक हो गई है, जो तमाम कोशिशों के बावजूद भी अपना वजूद नहीं तलाश पा रही है.
उत्तर- ऐसा नहीं है. निश्चित तौर पर हमने कुछ गलतियां की हैं और छोटी-मोटी कमियां रही हैं. हम इन्हें दूर करने की कोशिश कर रहे हैं. प्रदेशाध्यक्ष अजय माकन और पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बीच के मतभेद अब सुलझ चुके हैं. अरविंदर सिंह लवली के वापस लौटने के बाद समझा जा सकता है, कि कांग्रेस संगठन दोबारा जोश में है. हालांकि यह सिलसिला कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के पार्टी के अध्यक्ष बनने के बाद ही शुरू हो गया था, जिसका असर पहले गुजरात चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देने और अब राजस्थान में 3-0 से स्वीप करने के रूप में दिखा है. अब राजधानी में भी लोगों को कांग्रेस का एक यूनाइटेड फेस दिख रहा है, जिसके नतीजे जल्दी दिखने लगेंगे.
प्रश्न- प्रदेश में सांगठनिक मजबूती को किस नजर से देखते हैं? खासतौर पर जबकि प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं. ऐसे में यह यूनाईटेड फेस किस हद तक कारगर साबित होगा?
उत्तर- इस मजबूती को अब देखा जा सकता है, जो जमीन पर नजर आने लगी है. प्रदेशाध्यक्ष को लेकर जो आपसी असहमति की बात कही जाती थी, वह तमाम बातें अजय माकन जी और शीला दीक्षित जी ने साथ आकर खत्म कर दी हैं. और अब इस यूनाइटेड फेस का बड़ा फायदा दिखने लगा है. इससे लोगों में पिुर से कांग्रेस पर विश्वास जमा है. एक वक्त हालात ऐसे बने कि भारतीय जनता पार्टी किसी चुनाव जीतने वाली मशीन की तरह दिखाई देने लगी. लगता था जैसे कि भारतीय जनता पार्टी से पार पाना मुश्किल हो गया है. लेकिन पहले गुजरात के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की कड़ी टक्कर और अब राजस्थान में 3-0 से स्वीप के बाद लोगों का कांग्रेस में विश्वास वापस लौटा है. और उन्हें लगता है कि पार्टी वापसी कर सकती है.
प्रश्न- क्या इसे कांग्रेस की वापसी के तौर पर देखा जा सकता है?
उत्तर- निश्चित तौर पर यह होने जा रहा है. आज लोगों का मन बदल रहा है. खासतौर पर प्रधानमंत्री मोदी सरकार की नीतियों को देश की जनता अस्वीकार कर रही है. कांग्रेस भी अपनी कमियों को दूर करते हुए संगठन को मजबूत करने का काम कर रही है. हमने अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग टीमें बनाई हैं, जिनके बेहतर तालमेल के नतीजे अब दिखने लगे हैं. मैंने राजस्थान में इस उपचुनाव और अन्य क्षेत्रों में देखा है, कि मौजूदा सरकार के कामकाज से लोगों में बेहद असंतोष है और मैं कह सकता हूँ कि यकीनी तौर पर कांग्रेस वापसी करने जा रही है.
प्रश्न- आज राजधानी के व्यापारी सीलिंग से परेशान हैं, कांग्रेस व्यापारियों का समर्थन कर रही है, लेकिन इन हालातों के पैदा होने में कांग्रेस की भी बड़ी भूमिका रही है?
उत्तर- सीलिंग पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मॉनिटरिंग कमेटी आज जो कार्यवाही कर रही है, वह मौजूदा सरकार की लापरवाही का परिणाम है. इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के वक्त हमने व्यापारियों को राहत देने के लिए कानूनों में जो बदलाव किया था, मौजूदा सरकार आज भी उन्हें ही ढाल बनाकर इस्तेमाल कर रही है. हैरत की बात यह है, कि जिन 351 सड़कों को हम नोटिफाई नहीं कर पाए थे. 4 साल बीतने के बाद भी मौजूदा सरकार उन सड़कों को नोटिफाई नहीं कर पाई. यह मौजूदा सरकारों की विफलता है, कांग्रेस की नहीं.
प्रश्न- मौजूदा हालात में सीलिंग प्रक्रिया के चलते व्यापारियों के लिए क्या हालात देखते हैं?
उत्तर. देखिए, यह सरकार की विफलता है. यह सुप्रीम कोर्ट का काम है, कि वह कानून लागू कराने का काम करती है. लेकिन कानून बनाने का काम सरकारों का होता है जो यह दोनों सरकारें नहीं कर पार्इं. राजधानी दिल्ली में इससे पहले भी एक बार सीलिंग को लेकर हालात बेकाबू हुए थे, तब हमारी सरकार थी, लेकिन हमने विषय को हालात पर नहीं टाल दिया था, बल्कि उसमें सुधार की कोशिश की थी.  यह भी पढ़ें : पुरानी गलतियों से सबक लेगी कांग्रेस, नाराज कार्यकर्ताओं को करेंगे एकजुट मौजूदा हालात में नहीं लगता है, कि व्यापारियों को कोई बड़ी राहत यह दोनों सरकारें दे सकती हैं. इस मुश्किल वक्त में भी हम ही व्यापारियों के साथ हैं. उनकी आवाज सड़क पर हमने उठाई और कानूनी तौर पर भी उन्हें सहायता देने का काम किया है.
प्रश्न- राजधानी की नई नवेली पार्टी आम आदमी पार्टी की सरकार और निगम में भाजपा के कामकाज को कैसा मानते हैं?
उत्तर- यह दोनों ही सरकारें अपनी जिम्मेदारियां पूरी करने में बुरी तरह से विफल रही हैं. लोकलुभावन वायदों और लोगों को सब्जबाग दिखाकर ही यह दोनों पार्टियां सत्ता में आर्इं. और नतीजा यह है, कि जिस आम आदमी पार्टी को राजधानी की जनता ने दिल्ली में 67 विधानसभा सीटें दीं, उसे निगम में बुरी तरह से हरा दिया, यह उनकी विफलता का ही नतीजा था. मैं अपने ही क्षेत्र बादली विधानसभा की बात करूं तो वहां 3 वार्ड पर कांग्रेस और दो पर भाजना ने जीत दर्ज की, आम आदमी पार्टी खाता तक नहीं खोल पाई. वहीं निगम में भाजपा का कामकाज भी सिर्फ नए पार्षदों की लूट-खसोट तक ही सीमित है. कामकाज में यह जीरो साबित हुए हैं. निगम आज ऐसा निकाय बन चुका है जो विकास कार्य तो छोड़िए अपने कर्मचारियों को तनख्वाह तक नहीं दे पा रहा है. यह मिसमैनेजमेंट का सबसे बेहतरीन उदाहरण है.
प्रश्न- निगम की वित्तीय हालात को लेकर निगम के तीन टुकड़े करने पर भी कांग्रेस पर सवाल उठते रहे हैं, कि कांग्रेस ने ही इसे वित्तीय अराजकता में धकेल दिया?
उत्तर- ऐसा नहीं है, निगम के तीन हिस्से करने का मतलब गुड गवर्नेंस का था. अब यह सरकारों के ऊपर था, कि वह किस तरीके से काम करती हैं. वास्तविकता यह है, कि निगम रेवेन्यू नहीं बढ़ाना चाहता है और व्यवस्था को सुधारने के लिए भी काम नहीं करना चाहता है. और जब तक आप व्यवस्था को सुधारना नहीं चाहते हैं, तब तक उसमें सुधार नहीं हो सकता है. फिर इससे फर्क नहीं पड़ता है, कि निगम के हिस्से तीन हैं या एक.

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