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बच्चों, बूढ़ों और बीमारों के लिए जानलेवा हो सकता है स्मॉग, अब देखने का नहीं चेतने का वक्त

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सांकेतिक चित्र
राजधानी में एक बार फिर स्मॉग ने कहर बरपाया हुआ है. इस बार हालात बीते सालों के मुकाबले और भी बद्तर हो चले हैं.
Dr. Ankit Om, Senior Resident Doctor, Acharya Bhikshu Hospital Moti Nagar Delhi
बढ़ते पॉल्यूशन के चलते हॉस्पीटल्स मेंरोगियों की भीड़ बढ़ रही है, जबकि सरकारें इसे अब भी राजनैतिक मुद्दे की तरह डील कर रही हैं. स्मॉग को लेकर अब सबको अवेयर होने की जरूरत है, इसके क्या नुकसान हो सकते हैं और बीमारों तथा बच्चों, बूढ़ों के लिए यह कितना तकलीफदेह है इन मुद्दों पर जागरूक कर रहे हैं राजधानी के आचार्य भिक्षु हॉस्पीटल के सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर अंकित ओम….
क्या है स्मॉग
स्मॉग स्मोक और फॉग दोनों से मिलकर बना शब्द है. पॉल्यूशन और फॉग दोनों मिलकर स्मॉग की परिस्थितियां पैदा कर देते हैं. पॉल्यूशन और फॉग दोनों की मिली-जुली इस परत में भारी पॉल्यूशन ऊपर आ जाता है, जो कई तरह की परेशानियां पैदा करता है.
शरीर पर इसके क्या प्रभाव हैं.?
इसके सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव फेफड़ों पर देखने को मिलते हैं. आंखों में जलन के अलावा स्किन डिजीज भी हो सकती हैं. सबसे ज्यादा परेशानी पहले से ही बीमार लोगों के लिए होती है, जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर हो चुका है.
सबसे ज्यादा किन लोगों पर इसका प्रभाव पड़ता है.?
दमा और अस्थमा के पेशेंट के लिए तो यह जानलेवा सरीखा है. उम्रदराज लोगों के लिए सांस लेने में परेशानी की शिकायत हो सकती है. इसके अलावा यह बच्चों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह तमाम तरह के शारीरिक दुष्प्रभाव डालते हुए उनके विकास को बाधित करता है.
उपचार क्या हो सकते हैं..?
सबसे ज्यादा जरूरी है, कि सावधानी बरतें. खासतौर पर ऐसी जगह पर जाने से परहेज करें, जहां पर पॉल्यूूशन लेवल बहुत ज्यादा है. अगर संक्रमण हो जाए तो डॉक्टर की सलाह लेकर ही एंटीबॉयोटिक्स का सेवन करें.
स्मॉग की चपेट में हर बार दिल्ली ही क्यों..?
इसके बहुत सारे कारण हैं, जैसा कि दिल्ली के साथ लगते प्रांतों हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने की प्रक्रिया भी इसके लिए बड़ी हद तक जिम्मेदार है. लेकिन स्मॉग की परेशानी सिर्फ दिल्ली में ही नहीं है. उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से पर इसका असर देखने को मिलता है. लेकिन दिल्ली में आॅलरेडी हम पॉल्यूशन के लेवल को पार कर चुके हैं, इसलिए यहां तो हालात किसी गैस चैंबर जैसे बन जाते हैं.
पूर्ण नियंत्रण के लिए क्या कर सकते हैं..?
हम सभी को अब विचार करना होगा कि हालात किस कदर बद् से बद्तर हो चुके हैं. और अब इन्हें ज्यादा समय तक इग्नोर नहीं किया जा सकता है. सरकारों को भी ध्यान रखना होगा कि सिर्फ फौरी तौर पर उठाये जाने वाले सांकेतिक कदमों से आगे बढ़कर कुछ ठोस कदम उठाने होंगे. पॉल्यूशन को लेकर एनजीटी की गाइडलाइन का प्रॉपर पालन तथा आॅड-ईवन जैसे कदम दिखावे के लिए न हों, बल्कि अब इनका पूरी तरीके से पालन करने का वक्त आ गया है, अगर हम भावी पीढ़ी को एक अच्छा वातावरण देना चाहते हैं.
सबको होना होगा जागरूक
यह बहुत गौर करने वाली बात है, बीते दिनों हम सभी ने देखा कि क्रैकर्स पर जब सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई तो उस निर्णय को तोड़ने के लिए लोगों में जैसे होड़ लग गई. अब जरूरी है, कि तमाम लोग इस वातावरण को देखकर सबक लें कि हम कैसे माहौल में रह रहे हैं और इसे सुधारने के लिए हमें पॉल्यूशन बढ़ाने वाले हर काम को रोकना होगा.

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