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युद्ध का अंधेरा नहीं, शांति का उजाला हो

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india vs china
भूटान के दावे वाले डोकलाम में भारत और चीन की सेनाओं के बीच जारी तनातनी जिस तरह खत्म हुई वह भारतीय कूटनीति की एक बड़ी कामयाबी है. इससे न केवल भारत का अंतरराष्ट्रीय कद बढेÞगा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि एक साहसी लेकिन अहिंसक नेता के रूप में सामने आयेगी. उन्होंने अपने निर्णयों से यह सिद्ध किया है कि वे भारतीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम हैं. वे दोस्ती, विश्वशांति एवं सह-अस्तित्व भावना को लेकर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने चीन जा रहे हैं, निश्चित ही व्यापारिक हितों के साथ-साथ राजनैतिक संबंधों में प्रगाढ़ता आयेगी.
डोकलाम में भारत व चीन की सेनाओं के बीच बढ़ते तनाव को शांत करने में सफलता मिलने का अर्थ है, कि युद्ध की आशंकाओं पर विराम लगना. इस स्थिति का बनना दोनों ही राष्ट्रों के लिये शुभ एवं श्रेयस्कर है. डोकलाम विवाद की छाया जहां चीन के लिए हर लिहाज से नुकसानदेह थी, वहीं भारत भी बिना वजह युद्ध नहीं चाहता. जो भी हो, इस फैसले से दोनों मुल्कों की जनता को राहत मिली है.
डोकलाम में शांति का उजाला हुआ है. निश्चय ही यह किसी एक देश या दूसरे देश की जीत नहीं बल्कि समूची मानव-जाति की जीत हुई है. लगभग तीन महीने से चला आ रहा गतिरोध समाप्त हो गया है. इस अवधि में चीन ने न केवल भारत बल्कि विश्व को तनाव और त्रास का वातावरण दिया, अनिश्चय और असमंजस की विकट स्थिति दी. यह समय की नजाकत को देखते हुए जरूरी था और इस जरूरत को महसूस करते हुए दोनों देश डोकलाम से अपनी-अपनी सेनाएं हटाने के लिए तैयार हो गए हैं.
अब तक चीन कह रहा था कि भारत डोकलाम से पहले अपनी सेना हटा ले, उसके बाद ही कोई बातचीत होगी. भारत का कहना था कि दोनों देश एक साथ अपनी सेना वापस बुलाएं, उसके बाद वार्ता संभव है. चीन ने आखिरकार भारत की यह बात मान ली है. सच यही है कि भारत जो चाहता था उसे मानने के लिए चीन राजी होना पड़ा. यह चीन का अहंकार एवं अंधापन ही है, कि वह पहले दिन से ही ऐसे व्यवहार कर रहा था जैसे भारत उसके समक्ष कुछ भी नहीं. यथार्थ यह है कि अंधकार प्रकाश की ओर चलता है, पर अंधापन मृत्यु-विनाश की ओर, लेकिन भारत ने अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य का अहसास करा दिया.
वैसे भी अगले महीने चीन में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होने जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ब्रिक्स देश जिनमें भारत, रूस, ब्राजील, चीन, द. अफ्रीका संगठन की शीर्ष बैठक में हिस्सा लेने चीन जा रहे हैं. इस संगठन में ये केवल पांच देश ही हैं और इनके आपसी सहयोग से दुनिया में समानान्तर शक्तिशाली ध्रुव तैयार हो सकता है. ये पांचों ही देश विश्व की तेजी से विकास करती अर्थव्यवस्था वाले देश हैं. इन पांचों में से दो देशों की बीच यदि विवादों का स्तर सैनिक समाधान की हद तक पहुंचता है तो इस संगठन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा किया जा सकता है. इस दृष्टि से भी चीन का डोकलाम से सेना हटाने या उसकी तैनाती में संशोधन का प्रस्ताव स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा. वह कूटनीतिक रूप से कमजोर पाले में होने की वजह से भी उसे इस तरह समझौते के लिये विवश होना पड़ा. चीन पर भारत के साथ शान्तिपूर्ण संबंध बनाये रखने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी है, क्योंकि 1962 में जब उसने अपनी सेनाएं हमारे असम के तेजपुर तक में भेज दी थीं तब भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव में पीछे हटना पड़ा था. कूटनीतिक मोर्चे पर यह कोई छोटी घटना नहीं थी, बावजूद इसके कि भारत युद्ध में बुरी तरह हार गया था.
चीन का यह अहंकार ही है कि वह भारत को बार-बार कमजोर समझने की भूल करता है. चीन को मजबूरन यह फैसला लेना पड़ा, क्योंकि मौजूदा हालात उसके पक्ष में नहीं हैं. वह एक साथ कई मोर्चों पर उलझा हुआ है. दक्षिणी चीन सागर को लेकर अमेरिका से उसका तनाव बहुत बढ़ गया है. ऐसे में भारत से तनाव जारी रखना उसके लिए घाटे का सौदा हो सकता था. उसके व्यापारिक और निवेश हित भारत के साथ काफी गहरे हो चुके हैं. इस मोर्चे पर होने वाला कोई भी नुकसान चीनी अर्थव्यवस्था के लिए समस्या पैदा कर सकता था. सबसे बुनियादी वजह यह है, कि एक से एक विनाशकारी हथियारों की मौजूदगी के कारण युद्ध अव्यावहारिक हो गए हैं, भले सामरिक रणनीति का खेल चलता रहता हो. दूसरे, चीन को धीरे-धीरे लगने लगा था कि दबाव बनाने की रणनीति और डराने-धमकाने की भाषा नहीं चलेगी. अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसके खिलाफ है और अमेरिका समेत तमाम देश डोकलाम गतिरोध दूर होने का इंतजार कर रहे हैं. भारत और चीन आज हजारों मजबूत धागों से एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं. दोनों के बीच का सीमा विवाद भी ऐसा नहीं है कि रोजमर्रा का जीवन उससे प्रभावित होता हो या उस पर दोनों देशों का बहुत कुछ दांव पर लगा हो. यह ऐसा मसला है जिस पर शांति और सौहार्द के माहौल में बात होती रह सकती है. सामरिक दृष्टि से चाक-चौबंद रहने का हक भारत और चीन दोनों को है, लेकिन जिम्मेदार राष्ट्र होने के नाते दोनों के ऊपर क्षेत्र में अमन-चैन बनाए रखने की जवाबदेही भी है.
भारत ने चीन पर जो कूटनीतिक जीत हासिल की उसका संदेश उसकी चौधराहट से परेशान उसके पड़ोसी देशों के साथ-साथ समूची विश्व बिरादरी को भी जाएगा. चीन ने जिस तरह अपना चेहरा बचाते हुए अपने कदम पीछे खींचे उसका एक मनोवैज्ञानिक लाभ यह भी होगा कि भारत की आम जनता युद्ध की कड़वी यादों को भूल कर आत्मविश्वास से लैस होगी. इस सबके बावजूद चीन से सतर्क रहने में ही समझदारी है. क्योंकि जब तक चीन के अहंकार का विसर्जन नहीं होता तब तक युद्ध की संभावनाएं मैदानों में, समुद्रों में, आकाश में भले ही बन्द हो जाये, दिमागों में बन्द नहीं होती. इसलिये आवश्यकता इस बात की भी है कि कि जंग अब विश्व में नहीं, हथियारों में लगे. मंगल कामना है कि अब मनुष्य यंत्र के बल पर नहीं, भावना, विकास और प्रेम के बल पर जीए और जीते.
(ललित गर्ग, ये लेखक के अपने विचार हैं)

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