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क्या हैं अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियां…?

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सांकेतिक चित्र
एस्ट्रो डेस्क.
अणिमा- अष्ट सिद्धियों में सबसे पहली सिद्धि अणिमा हैं, जिसका अर्थ, अपनी देह को एक अणु के समान सूक्ष्म करने की शक्ति से है. जिस प्रकार हम अपनी नग्न आंखों से एक अणु को नहीं देख सकते, उसी तरह अणिमा सिद्धि प्राप्त करने के पश्चात दुसरा कोई व्यक्ति सिद्धि प्राप्त करने वाले को नहीं देख सकता है. साधक जब चाहे एक अणु के बराबर का सूक्ष्म देह धारण करने में सक्षम होता है.
आचार्य नवराज पंत
महिमा- अणिमा के ठीक विपरीत प्रकार की सिद्धि है महिमा. साधक जब चाहे अपने शरीर को असीमित विशालता करने में सक्षम होता है. वह अपने शरीर को किसी भी सीमा तक फैला सकता है. यह भी पढ़ें : कुंडली में पंचम स्थान पर निर्भर है संतान सुख… 
गरिमा- इस सिद्धि को प्राप्त करने के पश्चात साधक अपने शरीर के भार को असीमित तरीके से बढ़ा सकता है. साधक का आकार तो सीमित ही रहता है, परन्तु उसके शरीर का भार इतना बढ़ जाता है, कि उसे कोई शक्ति हिला नहीं सकती है.
लघिमा- साधक का शरीर इतना हल्का हो सकता है, कि वह पवन से भी तेज गति से उड़ सकता है. उसके शरीर का भार ना के बराबर हो जाता है.
प्राप्ति- साधक बिना किसी रोक-टोक के किसी भी स्थान पर, कहीं भी जा सकता है. अपनी इच्छानुसार अन्य मनुष्यों के सन्मुख अदृश्य होकर, साधक जहाँ जाना चाहे वहीं जा सकता है. उसे कोई देख नहीं सकता है.
पराक्रम्य- साधक किसी के मन की बात को बहुत सरलता से समझ सकता है. फिर चाहे सामने वाला व्यक्ति अपने मन की बात की अभिव्यक्ति करे या नहीं.
इसित्व- यह भगवान की उपाधि है, यह सिद्धि प्राप्त करने के पश्चात साधक स्वयं ईश्वर स्वरूप हो जाता है. वह दुनिया पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकता है.
वसित्व- वसित्व प्राप्त करने के पश्चात साधक किसी भी व्यक्ति को अपना दास बनाकर रख सकता है. वह जिसे चाहे अपने वश में कर सकता है. या किसी की भी पराजय का कारण बन सकता है.
नव निधियां- पद्म निधि, महापद्म निधि, नील निधि, मुकुंद निधि, नन्द निधि, मकर निधि, कच्छप निधि, शंख निधि, खर्व निधि। (आचार्य नवराज पन्त)

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