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जब बच्चे पेरेंटस के जीते जी करें प्रॉपर्टी की मांग, वसीयत ही उपर्युक्त विकल्प

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सांकेतिक चित्र
प्रश्न- गिरीश जी, मैं सीनियर सिटीजन हूँ. मेरी उम्र 75 वर्ष है. मेरा बड़ा बेटा मेरे साथ ही रहता है, जबकि छोटे बेटे की पोस्टिंग चेन्नई में है. मेरा छोटा बेटा एवं बहू मेरे आज्ञाकारी भी नहीं हैं. अक्सर मेरी उनसे प्रॉपटी को लेकर बहस होती रहती है. अब उसके दिमाग में हमारे किसी रिश्तेदार ने यह बात डाल दी है, कि तुम्हारे पिता यानी कि मैं अपनी सारी जायदाद इसलिए बड़े बेटे के नाम कर दूंगा, क्योंकि वह मेरे पास ही रहता है. जबकि मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है. कुछ दिन पहले छोटे बेटे का फोन आया था, बोला आपको अपनी जायदाद में से जो भी देना है, अपने जिंदा रहते ही दे दो. ताकि मेरा जायदाद को लेकर भाई से कोई विवाद ना हो. क्योंकि दोनों भाइयों की भी आपस में बनती नहीं है. गिरीश जी, जबसे मुझे छोटे बेटे का फोन आया है, तभी से मैं बहुत परेशान हूँ. कृपया बताएं कि जीवित रहते मुझे छोटे बेटे के नाम जायदाद का कुछ हिस्सा करना चाहिए या नहीं? -शिवपाल यादव
Girish Sharma, Property Conslutant
उत्तर- शिवपाल जी, हाल के दिनों में न्यूजपेपर जिन खबरों से पटे पड़े हैं, वह हैं खून, किडनैपिंग, कत्ल, एक्सीडेंट एवं बुजुर्गों पर अपनों द्वारा ही वार. समझ नहीं आ रहा कि समाज में वहशीपन क्यों अपनी बांहें पसारे जा रहा है. माहौल की तरफ देखें तो हर तरफ हाहाकार! कोई किसी को जीने ही नहीं देना चाहता. अधिकता की ललक ने इंसान की ख्वाहिशों में बहुत इजाफा कर दिया है. वह सब कुछ पाना चाहता है, परंतु करना कुछ नहीं चाहता. उसी प्रकार आजकल के कुछ नौजवान अपने माता-पिता की संपत्ति पर नजर गड़ाए हुए हैं. और उसके लिए वह अपने बुजुर्गों को नुकसान पहुंचाने में भी नहीं हिचक रहे हैं. माता-पिता किस प्रकार अपने बच्चों से अपनी रक्षा करें. कोई तो सख्त कानून बनना जरूरी है. अभी हाल ही में एक घटना घटित हुई, जिसमें एक शख्स ने कुकर से अपनी मां के सर पर हमला कर दिया. जब विवाद का विषय सामने आया, तो वह था प्रॉपटी विवाद. प्रॉपर्टी हड़पने की मंशा एक इंसान को ऐसा कृत्य करने को मजबूर कर देती है. और आए दिन नित नए तरीकों से बुजुर्गों पर अपनों द्वारा ही हमले की खबरें रोज समाचारों में पढ़ और देख रहे हैं. कभी-कभार समझ नहीं आता कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? असल में इसका सबसे बड़ा कारण जो मैं समझता हूँ, वह है प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतें और इंसानी सोच का गिरता स्तर.  यह भी पढ़ें : कहीं जी का जंजाल न बन जाये बजट की लिमिट लांघना ..? मेरी नजर में अपने बुजुर्गों की देखभाल करना कानून का विषय ना होकर संस्कार का विषय है. संस्कारी बच्चे कभी भी मां-बाप के जिंदा रहते उनसे उनकी अर्जित की हुई संपत्ति में से हिस्सा नहीं मांगते हैं. लेकिन अधिकतर मां-बाप अपने जिंदा रहते ही भावनाओं में बहकर अपनी अर्जित की हुई चल और अचल संपत्ति अपने विवेकानुसार बच्चों में बांट देते हैं. यहीं कभी-कभार उनसे चूक हो जाती है. जिसका एक बड़ा उदाहरण हिंदुस्तान के एक उच्च परिवार, जो कि कपड़े की कंपनी रेमंड इंडस्ट्रीज के मालिक श्रीपत सिंघानिया के परिवार में घटित हो चुका है. जिन्होंने अपने जीते जी कंपनी के अधिकतर शेयर भावनाओं में बहकर अपने बेटे के नाम कर दिए और उसके कुछ समय के बाद बेटे ने अपने मां-बाप को घर और व्यापार से ही बेदखल कर दिया. पूरे देशवासियों ने सोशल मीडिया के माध्यम से उनकी आपबीती देखी और सुनी. सिंघानिया दंपति आज एक छोटे से किराए के मकान में रहकर गुजर-बसर कर रहे हैं.
हालांकि आज के युग में भी सभी बच्चे ऐसे नहीं होते. मेरे विचार से आज के युग में भी बच्चों में श्रवण कुमार का रूप देखा जा सकता है. लेकिन बहुत कम.
शिवपाल जी, आप वसीयत के द्वारा अपने विवेकानुसार अपने दोनों बच्चों में संपत्ति का बंटवारा कर दें, जो कि आपकी मृत्यु के बाद ही उनको प्राप्त हो पाएगी. शायद वसीयत द्वारा किए इस बंटवारे से बच्चों के दिमाग में आया वहम दूर हो जाए और क्या मालूम दोनों भाइयों में प्यार का इजहार भी बढ़ जाए. किसी शायर ने ठीक ही कहा है-
चेहरे पर मुस्कान, दिल में लेकर खाई बैठे हैं.
करके सारे लोग हिसाब-ए पाई-पाई बैठे हैं.
आज ‘वसीयत’ करने वाले हैं बाबूजी दौलत की.
घर में पहली बार इकट्ठे दोनों भाई बैठे हैं.
और अधिक जानकारी के लिए आप गिरीश शर्मा के फेसबुक पेज Shanti Properties (Regd.) पर जाकर उनके पिछले लिखे लेख देख सकते हैं, और समय लेकर मिल भी सकते हैं .

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