Home National कब रूकेगा माननीयों के बड़बोलेपन का सिलसिला..!

कब रूकेगा माननीयों के बड़बोलेपन का सिलसिला..!

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सांकेतिक चित्र
विशेष रिपोर्ट.
भारतीय संसद बड़बोले राजनेताओं के असभ्य और उग्र व्यवहार तथा आचरण में कमी के जानी जाने लगी है. बार-बार रुकावट और नाम की कॉलिंग सदन में आम बात है. लेकिन यह आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि जिस सदन में एक तिहाई से ज्यादा सदस्यों के खिलाफ खून, बलात्कार और सांप्रदायिक असंतोष सरीखे संगीन आरोपों के लंबित आपराधिक मामले हों, वहां इससे अलग की उम्मीद भी क्या की जा सकती है? घर में अश्लील साहित्य देखने से लेकर सत्र के दौरान खर्राटे लेते हुए पकड़े जाने तक भारतीय राजनेताओं ने सब कुछ किया है. भारतीय संसद में विरोध लगभग हर दिन का मामला है. लेकिन इस विरोध की आड़ में राजनेता कब सीमा लांघ जाते हैं, पता ही नहीं चलता. ताजा मामला संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कांग्रेस सदस्य रेणुका चौधरी पर की गई टिप्पणी का है. जिसे भाजपा जहां हास-परिहास कहकर मामले को हल्का करने में जुटी है, वहीं कांग्रेस इसे महिला अस्मिता से जोड़ने पर आमादा है. एक हद तक यह सच भी है, कि अगर संसद में रेणुका चौधरी के उस दिन के आचरण को संसदीय गरिमा के विपरीत मान भी लें तो प्रधानमंत्री ने भी कहां अपने पद और कद की गरिमा रखने का काम किया. लेकिन नेताओं की जुबान फिसलने का कोई यह पहला या आखिरी मामला नहीं है. भारतीय राजनेता थोड़े-थोड़े समय के बाद ऐसे विवाद पैदा करते रहे हैं.
जब वोट देने की बात आती है तो एक मतदाता के दिमाग में एक राजनीतिज्ञ या एक नेता की व्यक्तिगत नैतिकता हमेशा प्रश्न में होती है. हालांकि भारत में, किसी भी राजनेता द्वारा देश के सामने आने वाले मुद्दों पर राजनीतिक रुख के बावजूद व्यक्तिगत हमले करना एक फैशन सा बन गया है. 2012 में, जब मौजूदा प्रधान प्रधानमंत्री और उस समय के विपक्षी नेता नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय मंत्री शशि थरूर के खिलाफ उनकी पत्नी सुनंदा पुष्कर को 50 करोड़ की गर्ल फे्रंड कहकर व्यक्तिगत हमला किया, तब भी मीडिया भले ही अपने चरम पर था, लेकिन जवाब स्वयं थरूर ने दिया कि मेरी पत्नी अनमोल है. हालात आज भी जस के तस हैं, तीन साल बाद भी अविवेकी और व्यक्तिगत हमलों के खिलाफ जनसामान्य में कोई प्रतिक्रिया नहीं होती, समाज को यह परेशान नहीं करता, इसके खिलाफ सिर्फ व्यक्तिगत प्रक्रिया ही होती है.
शायद यही कारण है, कि समाज में अपेक्षित विरोध न होने के चलते नेता तमाम सीमाएं लांघने पर आमादा रहते हैं. यह भी पढ़ें : संतुलित रवैय्ये से निकलेगा सीलिंग का समाधान, अनियोजित विकास ने पैदा की परेशानियां
इसी की एक बानगी तब देखने को मिली थी, जब मोदी सरकार में फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज राज्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने 1 दिसंबर को दिल्ली में एक चुनाव रैली में वोट देने के लिए रामजादों और हरामजादों के बीच से किसी एक को चुनने का विवादास्पद नारा दे दिया था.
क्या दिल्ली में मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लिए इसे सिर्फ स्लिप और टंग कहा जा सकता था, या फिर यह एक शातिर चाल थी? ऐसे सवाल उठते रहेंगे, लेकिन राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण हैं. याद करें समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने सार्वजनिक रूप से प्रतिद्वंद्वी राजनीतिज्ञ अमर सिंह को मई 2009 में दलाल तक कह डाला था. यही नहीं राजस्थान टोंक में भाजपा के एक विधायक ने सार्वजनिक भाषण में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के कपड़े छीनकर इटली वापस भेजने का बयान दिया था.
उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री मोदी के अभियान प्रबंधक और अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के आक्रामक बयान पर अप्रैल में भारतीय चुनाव आयोग ने रैलियों और उत्तर प्रदेश में उनके भाषण देने पर प्रतिबंध लगा दिया था.
इसी तरह, ईसीआई ने योग गुरु बाबा रामदेव की टिप्पणी पर लखनऊ में प्रचार पर प्रतिबंध लगा दिया था कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी हनीमून और पिकनिक के लिए दलितों के घर जाते हैं.
राजनीति में अपमानजनक भाषा के प्रयोग का वैश्विक रुझान रहा है. समय-समय पर आमतौर पर कानून के माध्यम से या राज्य उपायों के माध्यम से सार्वजनिक रूप से अपमानजनक बयानों के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के लिए प्रयास किए जाते रहे हैं, लेकिन उन्होंने बहुत कम प्रभाव डाला है.
वास्तविकता यही है, कि सबसे अधिक महत्वपूर्ण आत्मसंयम है जो खुद राजनीतिज्ञों को अभ्यास से हासिल करना होगा. हालांकि अगर किसी साध्वी तक ने ऐसी अपमानजक राजनैतिक भाषा का इस्तेमाल किया हो तो राजनीतिक संस्कृति को ही नए सिरे से असेंबल करने की जरूरत है.

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