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हवा, लहर के झांसे में न आएं मतदाता, अपना अमूल्य वोट किसको दें, कैसे तय करें..?

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डॉ. रिखबचंद जैन, फाईल फोटो
लोकतन्त्र दुनिया के इतिहास में सबसे अच्छी राज्य व्यवस्था है. राजशाही, तानाशाही और सेनाशाही के जुल्म तथा अन्याय से पूरा इतिहास भरा पड़ा है. प्राचीन ग्रीस, रोम, मिस्र और भारत में भी गणतान्त्रिक व्यवस्थाएं किसी-किसी काल खंड में कुछ क्षेत्रों में रही हैं. गणतन्त्र का मतलब न्याय का राज्य. समानता का राज्य. लोगों द्वारा निर्धारित राज्य व्यवस्था लोगों के हित के लिए, लोगों की सुरक्षा के लिए और लोगों द्वारा ही या उनके द्वारा निर्धारित प्रतिनिधियों द्वारा संचालित राज्य व्यवस्था. लोकतन्त्र का मुख्य उद्देश्य कल्याणकारी राज्य होना है, न कि अन्याय करने वाला राज्य. राज्य व्यवस्था में लिंग, जाति, समुदाय, रंग, धर्म तथा अन्य किसी भी बात पर भेदभाव नहीं करना. सबको समान अवसर, सबको समान अधिकार, सबकी सुरक्षा, सबका कल्याण, सबका विकास. यह भी पढ़ें : नार्थ एमसीडी के स्टैंडिंग कमेटी चेयरमैन तिलकराज कटारिया दिल्ली रत्न पुरस्कार से सम्मानित, सामाजिक कार्यों के लिए किया गया पुरस्कृत  ऐसी लोकतान्त्रिक राज्य व्यवस्था में अक्सर जनसाधारण अपने वोट देने के अधिकार से बेवाकिफ या इरादतन अलग रह जाता है. अच्छे प्रतिनिधि चुनने के लिए वोट की प्रक्रिया में भाग नहीं लेता है. वोटिंग प्रतिशत घटने पर सब लोगों द्वारा चुनाव में भाग न लेने पर, जो चुनाव के फैसले होते हैं उनमें कई कमियां रहनी संभव हैं. फलस्वरूप सरकार अच्छी नहीं भी हो सकती है और जो निर्णय ऐसी सरकार ले वो लोगों को स्वीकार नहीं भी हो सकते हैं. इसलिए सही प्रतिनिधि चुनना और सरकार की गतिविधियों पर जन-जागरण द्वारा अंकुश लगाये रखना जरूरी है. लोकतन्त्र की सफलता, जनकल्याण, विकास और लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं की सही पालना नागरिक जागरूकता से ही संभव है. समझदार सोच वाले नागरिक हमें क्या फर्क पड़ता है? हम क्या करें सोचकर? निष्क्रिय होकर बैठना लोकतन्त्र के लिए बहुत नुकसानदेह हो सकता है. ऐसे लोग राजनीति में नहीं भी आयें, राज्य व्यवस्था में भाग नहीं भी लें तो उस पर नजर तो रखें! गलत निर्णयों का विरोध नागरिक एकजुट होकर करें. सही निर्णयों में हो रही देरी के लिए विरोध कर सरकार का ध्यान उस तरफ खींचें और सच्चे, जनकल्याणकारी निर्णयों को आगे बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयास करें. जब जनता देखती रहती है तो जनप्रतिनिधि, नेतागण, राजनैतिक पार्टियां, शासन-प्रशासन और सरकार कोई भी गलत कदम उठाने से रूकती है और सही कदम उठाने के लिए बाध्य होती है.
गणतान्त्रिक व्यवस्था में वोट अमूल्य होता है. एक वोट से कई प्रत्याशी हार जाते हंै या जीत जाते हैं. इसलिए इसका महत्व इसी बात से समझा जा सकता है. निष्पक्ष, शांतिपूर्ण शत-प्रतिशत वोटिंग ही किसी भी लोकतान्त्रिक राज्य व्यवस्था का प्राण है. इसलिए वोट अवश्य दें.
वोट किसको दें? किस पार्टी को दें? किस प्रत्याशी को दें? यह एक बड़ा विकट प्रश्न है. इसका उत्तर मतदाता को स्वयं ढूंढ़ना है. सही उतर ढूंढ़ने के लिए जो कुछ आवश्यक बातें हंै, जिन्हें जानकर सही उत्तर मतदाता को स्वयं मिल सकता है.
भारत की राजनैतिक व्यवस्था में मल्टी पार्टी प्रथा है. प्रत्येक पार्टी चुनाव से पूर्व अपने-अपने चुनाव घोषणा पत्र जारी करती है. अत: पार्टी चाहे पुरानी हो या नई, या किन्हीं पार्टियों का गठजोड़, मतदाता अगर सम्भव हो तो उनके घोषणा पत्र, उनके इरादे और वास्तविकता को जरूर जांचें. कम से कम मोटे तौर पर. कौन सी राजनैतिक पार्टी किस तरफ निर्णय ले जायेगी? कौन सी पार्टी जीतेगी? कौन सी पार्टी सरकार बनाने में सक्षम और अच्छी है? कौन सी पार्टी के उद्देश्य, तौर-तरीके और घोषणा पत्र आपकी सोच के अनुरूप है, इस पर विचार करते हुए ऐसी पार्टी को समर्थन देना चाहिए, जिसके घोषित उद्देश्य, तौर-तरीके और विश्वनीयता से आप सहमत हों.
वर्तमान भारत की राज्य व्यवस्था में निर्दलीय प्रत्याशी कोई भी प्रभावी काम नहीं कर सकता. इसलिए कुछ दशकों से सभी मतदाता निर्दलीय प्रत्याशी को, कुछ अपवादों को छोड़कर चयन नहीं करते हैं. निर्दलीय सदस्य अक्सर सरकार का भाग भी नहीं बनते हैं. सरकारी विभाग या सदन में कुछ आगे नहीं करवा सकते हंै. उनका जीतना सिर्फ उनके अपने गौरव के लिए ठीक है, देश के लिए योगदान बहुत ज्यादा संभव नहीं है. अगला प्रश्न है, छोटी पार्टियों के बारे में। छोटी पार्टियां अगर बड़ी पार्टी के साथ में गठजोड़ में नहीं आती हैं, तो उनकी स्थिति भी निर्दलियों की तरह ही है. अगर कोई भी बड़ी पार्टी बहुमत हासिल करने में सफल नहीं होती है तो छोटी पार्टियां चुनाव के बाद भी सबसे बड़ी पार्टी के साथ मिलकर कुछ कर सकने का मौका कभी-कभी मिलता है.
एक विषय प्रत्येक मतदाता की सोच में टकराता रहता है, कि उसे पार्टी देखनी चाहिए या पार्टी द्वारा नामांकित प्रत्याशी का व्यक्तिगत चाल-ढाल और विश्वास. इस प्रश्न का उत्तर भी यही सही होगा कि अगर उस व्यक्ति का व्यक्तिगत चाल-ढ़ाल, व्यवहार, उत्तरदायित्व निभाने की सक्षमता, उसकी हैसियत, उसकी काबलियत, उससे आप सन्तुष्ट नहीं हैं चाहे वो किसी अच्छी पार्टी का ही प्रत्याशी क्यों न हो, आप उसे वोट न दें. ऐसे गलत नामांकित व्यक्ति को वोट न देकर, चाहे वो पार्टी सरकार बनाने के योग्य हो या अच्छी सोच की पार्टी ही क्यों न हो, आप यह सन्देश राजनैतिक पार्टी को दे सकते हैं, कि अगर कोई राजनैतिक पार्टी गलत व्यक्तित्व को नामांकित करके जनप्रतिनिधि के लिए पेश करती है तो जनता उसे नकार कर पार्टी को भविष्य में सही व्यक्ति नामांकित करने के लिए भी बाध्य कर सकती है. गलत नामांकित लोगों का विरोध तो होना ही चाहिए. हर हालत में किसी भी सूरत में ऐसे व्यक्ति को नकार दें. इससे लंबे समय में समाज को, क्षेत्र को फायदा ही होगा.
इसके बाद प्रश्न रह जाता है, कि जिस व्यक्ति को आप वोट देना चाहते हैं, उसके बारे में क्या-क्या जानकारियां लें? प्रत्याशी के बारे आपको यह जानना है, कि उसका व्यवहार, चाल-ढ़ाल, चरित्र, विश्वनीयता, कैसी है? क्या वो नि:स्वार्थ सेवा करेगा? या वो अपने हित में लगा रहेगा? क्या वो जनकल्याण के लिए समर्पित रहेगा? क्या वो अच्छा वक्ता है? क्या वो अपनी सोच, अपनी बात, अपना पक्ष निर्णय लेने वालों के समक्ष अच्छी तरह से रख सकता है? अगर राजनैतिक और सार्वजनिक कार्य क्षेत्र में वो नया नहीं है तो उसका पीछे का रिकॉर्ड कैसा है? उसकी क्या योग्यताएं हैं? क्या वो जनता की आवश्यकता समझता है? क्या वो जनता की सोच से परिचित है? और क्या वो जनता के बीच में खड़ा होकर उनके दुख-दर्द को समझ सकता है? याद रखिये चुनाव के समय सब नरम और लंबे-चौड़े वादे करने को तैयार रहते हैं. चुनाव के बाद भूल जाते हैं, मिलते ही नहीं. इन तथ्यों पर आप प्रत्येक प्रत्याशी की जांच करें, प्रत्येक पार्टी की जांच करें. अपने समझदार मित्रों और समझदार निष्पक्ष लोगों से राय लें. निष्पक्ष लोगों की राय ज्यादा असरदार होती है, न कि राजनीति से संबंधित लोगों की.
उपरोक्त लिखी बातें व्यक्तिगत रूप से आपको सही व्यक्ति या सही पार्टी का चयन करने में मददगार होंगी. इन उपरोक्त बताई गई बातों के अलावा भी स्थानीय तौर पर कुछ और मसले या कुछ और जानकारियां भी जरूरी हो सकती हैं. उनको भी जानने का प्रयास करें.
प्रत्येक मतदाता लोगों की कही-सुनी बात पर जाये। न ही जल्दी से राजनैतिक वायदों पर न फिसलें, न प्रलोभन में आएं. सही कसौटी पर जांचना आवश्यक है. हवा के साथ न बहें, लहर पर न चलें. अपने विवेक का प्रयोग करें और सही व्यक्ति, सही पार्टी को अपना अमूल्य वोट देकर सच्ची लोकतान्त्रिक राज्य व्यवस्था स्थापित करने में अपना कर्तव्य निभायें.
(डॉ. रिखब चन्द जैन, लेखक भारतीय मतदाता संगठन के अध्यक्ष और टी.टी. ग्रुप के चेयरमैन हैं)
मो. 9810279446

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