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103 साल पुरानी दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन से युवा डॉक्टर्स क्यूं हो रहे हैं उदासीन.? गलत हेल्थ पॉलिसीज से बढ़ता ब्रेन ड्रेन

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सांकेतिक चित्र
103 साल पुरानी दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन से युवा डॉक्टर्स की विमुखता, बढ़ते ब्रेन ड्रेन और डॉक्टरी पेशे से युवाओं की उदासीनता समेत हेल्थ सेक्टर की गलत नीतियों पर चर्चा कर रहे हैं सीनियर रेजीडेंट्स डॉक्टर अंकित ओम

डॉ. अंकित ओम, सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर आचार्य भिक्षु हॉस्पीटल
भारत की एकमात्र सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से भी ज्यादा पुरानी संस्था दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन से आज युवा डॉक्टर्स का पूरी तरह मोहभंग हुआ दिखाई पड़ता है. इसका एक प्रमुख कारण है, कि देश भर के डॉक्टर किसी न किसी नई संस्था को माध्यम बनाकर सरकारों के समक्ष अपनी चिंताओं और जरूरतों को समझाते नजर आ रहे हैं. आखिर क्या वजह है जो युवा डॉक्टर खुद को इस संस्था से जोड़ने के लिए इच्छुक नहीं नजर आते? इसका एक तार्किक विश्लेषण हम कई बिन्दुओं पर करेंगे. डी.एम.ए का गठन 1914 में हुआ, जबकि आई.एम.ए का गठन 1928 में वजूद में आया. सन् 1941 में डी.एम.ए का बिना अपना वजूद खोये आई.एम.ए में विलय हो गया. देश की आजादी से पहले और बाद में भी चिकित्सक वर्ग किसी भी राजनीतिक दल की विचारधारा के अधीन नहीं हुआ. यही वजह रही कि चिकित्सकों ने सेवा भाव से एक से ज्यादा पीढ़ी के लिए इस व्यवसाय में सेवा का भाव मूलरूप से अपनाया.
एक तरफ विभिन्न व्यवसाय जो निजीकरण के आसानी से शिकार हुए. लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं पर इतने सवाल कभी नहीं खड़े हुए जितने आज के दौर में एक आम बात बन चुके हैं. मुझे नहीं लगता कि कोई भी राजनैतिक दल स्वास्थ्य सेवाओं में राजनीति की सोच को बढ़ावा देता होगा. मगर आज का सत्य यही है, कि जितना स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण हुआ है, उससे कहीं ज्यादा स्वास्थ्य सेवा राजनीति का शिकार बनकर रह गई है. भारत एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बावजूद स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहद पिछड़ी हुई नजर आती है. नेशनल हेल्थ पॉलिसी 2017 जिसे लगभग 15 वर्ष लगे, उसके अनुसार देश की स्वास्थ्य सेवाओं पर मौजूद 1.3 प्रतिशत जीडीपी खर्च को बढ़ाकर न्यूनतम 4 प्रतिशत पर करना अनिवार्य बताया गया, जबकि दुनिया में अन्य देश औसत 6 प्रतिशत जीडीपी व्यय करते हैं.  यह भी पढ़ें : पटेल नगर थाने में निशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन, एक्सपर्ट ने दिए हड्डियों को स्वस्थ रखने के चिकित्सीय परामर्श स्वास्थ्य की प्राथमिकता पर शायद ही कोई सवाल करे, मगर स्वास्थ्य नीतियां इस पर कहीं भी खरी उतरती नहीं दिखाई देती. जिस तेजी से देश अपने युवाओं को इस आदर्श सेवा से विमुख कर रहा है, उसकी वजह है गलत हेल्थ पॉलिसीज. देश में लगभग 10 लाख डॉक्टर हैं. जैसा कि हम सब जानते हैं, कि भारत गांवों में बसता है. लेकिन बावजूद इसके 25 फीसदी डॉक्टर देश के तीन चौथाई हिस्से में अपनी सेवाएं देते हैं और 75 प्रतिशत डॉक्टर मात्र एक चौथाई जनसंख्या को. आंकड़ों का ये खेल शायद आम आदमी की प्राथमिकता में न हो, मगर यह एक कड़वा सच है, कि देश से युवा डॉक्टर अब गायब हो रहा है. आज कोई भी डॉक्टर आने आनी वाली पीढ़ी को डॉक्टर बनने की प्रेरणा न देकर शायद उसके भविष्य को तो अंधकार से बचा ले, मगर देश का भविष्य जरूर स्याह होने वाला है. आज जरूरत है, कि डी.एम.ए जैसी संस्थाएं युवा डॉक्टर्स को मुख्यधारा से जोड़कर फिर से मेहनतकश भारतीय चिकित्सकों को एक ऐसा माहौल बनाकर दें, जिसमें युवा डॉक्टर्स को अपनी मेहनत की पहचान के साथ-साथ नीतियों में भागीदारी मिले. जो देश अपने युवाओं की अनदेखी करता है वो वर्तमान में कितना मजबूती से रहे, मगर भविष्य में सिर्फ पतन का शिकार होता है.
युवा डॉक्टर्स से भी एक अपील है, कि जब वजूद का सवाल हो तो सबको साथ रहकर प्रयत्न करने से ही सफलता हासिल होगी. खुद से एक सवाल पूछें कि वो अब तक 103 वर्ष पुरानी एकमात्र डॉक्टरों की संस्था से जुड़ने में क्यों नाकामयाब रहे? वरिष्ठ डॉक्टरों से शायद हम युवा सवाल न कर सकें, मगर इस विफलता की जवाबदेही तो होगी? क्यों आज देश को विकृत स्वास्थ्य नीतियों का सामना करना पड़ रहा है और क्यों युवा डॉक्टरों को देश छोड़ना पड़ रहा है? इस तंत्र में युवा डॉक्टर कहां हैं?

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